Wednesday, 23 January 2019

भूख और प्यास के पक्ष में

बहुत से हाथ उठे थे
बहुत से उठने बांकी थे
मांग थी
एक अदद रोटी की
भूख की त्रासद
मिटाने के निमित्त
इसीलिए आज चुप रहने की अपेक्षा
की गई थी चुप्पी के विरुद्ध
मुनादी
शायद आवाज की
गड़गड़ाहट से
सूख जायेंगे बहुत से हलक
परिणामस्वरूप ढूंढे जाने लगेंगे
हथकण्डों के रूप में
बहुत से उपाय
चुप्पियों के निमित्त
बावजूद इसक पहली बार
तोड़ी जायेगी
सदियों से ओढ़ी हुई चुप्पी
भूख और प्यास के पक्ष में

Sunday, 20 January 2019

"हंसते रंगों की भीड़ "

हंसत थे लाखों रंग 
दुकानें सजी थीं
सजे थे करीने से
आलमारियों के खांचे
तलाश रहे थे लोग
रुबरू होने के बहाने
मुस्कुराहटों ने उलटे थे
अनगिनत स्वप्नों के
परत दर परत
अनदेखे पन्ने
कुछ खोये थे
किताबों के आवरणों के रंगों में
कुछ जीवन के पन्नों में
खंगाला जा रहा था
अतीत से
वर्तमान तक का सफ़र
और तलाशा जा रहा था
रुचियों का कैटेलाग
लाज़मी था कुछ
उथल पुथल का होना
सिसकियों के बीच दानवी
हंसी का आना
कुछ निभा रहे थे
औपचारिकताएं
मित्रों से किये गये वादों की
कुछ खोज रहे थे
सेल्फ़ियों के बहाने
रंगीन तितलियों के पर
यद्यपि ऐसे लोगों नहीं करते
किसी की भी परवाह
न ही रखते है किसी से
कोई रफ़्त जब्त
कुछ वास्तव में देख रहे थे
पुस्तकों का मोहक संसार
और उनके आचार व्यवहार
प्रकाशक भी गिरहकट की तरह
तैयार थे
काटने को भारी भरकम जेब
चल रहा था आरोप प्रत्यारोप का
कभी न खत्म होने वाला दौर
कुछ ठहाके अनायास गूंजे थे
मानो खिल उठा हो
बिजली का फूल
जहां तहां चल रहा था
बधाईयाँ का दौर
उड़ रही थीं
कुछ रसीदी टिकट सी
कागजों की चिंदियाँ
मानों दे रहीं हो गवाही
बाजार के उठने की
हाँ हाँ यह शंखनाद था
विश्व पुस्तक मेले के अवसान का
कुछ यादें पेवस्त हो रहीं थीं
दिमाग के सुरक्षित कोनों में
और तैयार कर रहीं थी
खुद को
आगामी तिथिक्रम की प्रतीक्षा के निमित्त
आज दिल्ली थोड़ी मायूस थी
किन्तु शीघ्र ही भुला देगी
सब कुछ
और खो जायेगी
एक अनाम शोर की
भीड़ में
जैसे हम सभी खो जाते हैं
हंसते रंगों की भीड़ में
          प्रद्युम्न कुमार सिंह

Friday, 28 December 2018

******एक बूढ़ा******

ठंड के संत्रास में भी
हँस रहा था
एक बूढा
दिख रहा था
टनाटन लोहे सा
मानों मौत से
जूझने आया हो
उसकी हँंसती आंखे
कुछ कह रहीं थी
मौन भाषा में
ठीक से सुन नहीं पाया
शायद उनका इशारा
संसार की बेरूखी
एवं स्वार्थलिप्सा की ओर था
मै कुछ पूँछता
उससे पूर्व ही
गड़ चुकीं थीं
मुझ पर उसकी आंखे
शायद वह पूँछना चाहता था
मेरे अतिरिक्त इस खुले
आसमान के नीचे
तुम कैसे ?
मैं झेप गया
और कुछ नहीं पूँछ सका
शायद मेरा झेपना ही
मेरे प्रश्न का जवाब था ।

Wednesday, 26 December 2018

*****सलीबों में कहां लिखा होता है*****

सलीबों में कहां
लिखा होता है
किसी का नाम
फिट बैठे जिस पर
उसी के नाम
यद्यपि बदलते रहे
समय के साथ
उनके नाम और काम
फिर भी कायम रहा रुतबा
कभी सूली,
कभी फांसी,
कभी डाई,
कभी ज़हर के नाम
टीसती रही वेदना
और वेदना का ज्वार
क्योंकि सलीब के नामों से
नहीं वेदना के अनेक नाम
फिर चाहे अमीर हो
या हो गरीब
स्त्री हो या हो पुरुष गम्भीर
बचपन हो मासूम
या बूढा अधीर
सलीबों में कहाँ
लिखा होता है
किसी का नाम
कोई चढकर ईसा कहलाता
कोई पीकर सुकरात होता
कोई देश के खातिर
हंसते हसते फंदा
गले लगाता
और निशां दूर तलक छोड़ जाता
क्योंकि सलीबों में कहाँ
लिखा होता है
किसी का नाम
फिट बैठे जिस पर उसी के नाम

Tuesday, 30 October 2018

*****सरदार !*****

सरदार !
कैसे बांधा जा सकता है ?
तुम्हे सीमाओ की परिधि में
सीमाओं से भी
बहुत ऊंचा हैं तुम्हारा कद
आखिर तुम कैसे समा सकते हो ?
बुतों की परिधि में
जबकि तुम्हारी आवाज
आज भी बसी हुई है
करोड़ों हृदयों में
किसी एक प्रतिमा में
नहीं रखा जा सकता है जिसे सुरक्षित
हक-औ'-हुकूक के लिए
उठी हुंकार आज भी
बनी हुई है
नवयुवकों के लिए
प्रेरणास्रोत
किन्तु सरदार ! आज
तुम्हारा बुत  रौंद रहा है
अस्तित्व
क्या तुम अब भी लड़ सकोगे
उसी मज़बूती के साथ
अपने ही बुत से
या फिर बूढे हो इंकार कर दोगे
दम तोड़ते अपने ही विचारों को
को पहिचानने से
नहीं नहीं सरदार तुम ऐसा नही
कर सकते
क्योंकि हमें उम्मीद है
तुम कल के सरदार की तरह
आज भी सरदार हो
जो फर्ज़ के लिए हमेशा डटा रहा
देश के एकत्रीकरण में ।

***** कभी नहीं ठहरता*****

कभी नहीं ठहरता
वक्त का घूमता पहिया
इसीलिए कभी नहीं ठहरती
धरती
और कभी नही ठहरता
आकाश
और नही ठहरते हैं
दिन और रात
यद्यपि लोग दावे
बहुत बड़े बड़े करते हैं
वक्त को रोकने के
पर ठहर नही पाते
उसकी गति' के सामने
या यूं कहें
नहीं रोक पाते
उसकी गति के सापेक्ष
अपने आप को
और इन सबसे से
अछूता वक्त तय करता है
अपने फासले
और बनाये रखता है
अपनी विश्वसनीयता
और पहिचान

******ढीठ लड़कियां******

कहाँ से आ जाती हैं
ये ढीठ लड़कियां
कभी पानी के बहाने
कभी नालिश के बहाने
बहुत ही उजड्ड है
यह लड़कियां
समझती नहीं संस्कारों को
थोड़ा बहुत होता तो चल जाता
पर बार बार आकर
प्रश्न पूंछती हैं
कुछ ऊल जुलूल से
जैसे प्रेम किसको समझे
धोखा किसको
कौन से कपड़े शालीन है
कौन से अशालीन
कैसे चलें ,कैसे बैठे ,कैसे बोले
क्या खाये क्या न खाए
कब बोले कब मौन रहे
आखिर कैसे जवाब दिया जा सकता है
इन बचकाने सवालों का
यह तो उफ !
वाली है बात
ढीठ लड़कियां
मांगने लगी हैं अपने अधिकार
करने लगी कोशिश
वह सब कुछ जानने की
जिसे अपनाकर प्राचीन काल से
आज तक हम करते आये हैं
उनके हकों का हरण
बात बात पर करती हैं
न्यायालय के आदेश की बात
आखिर कितनी ढीठ हो गई हैं
यह लड़कियां