सरदार !
कैसे बांधा जा सकता है ?
तुम्हे सीमाओ की परिधि में
सीमाओं से भी
बहुत ऊंचा हैं तुम्हारा कद
आखिर तुम कैसे समा सकते हो ?
बुतों की परिधि में
जबकि तुम्हारी आवाज
आज भी बसी हुई है
करोड़ों हृदयों में
किसी एक प्रतिमा में
नहीं रखा जा सकता है जिसे सुरक्षित
हक-औ'-हुकूक के लिए
उठी हुंकार आज भी
बनी हुई है
नवयुवकों के लिए
प्रेरणास्रोत
किन्तु सरदार ! आज
तुम्हारा बुत रौंद रहा है
अस्तित्व
क्या तुम अब भी लड़ सकोगे
उसी मज़बूती के साथ
अपने ही बुत से
या फिर बूढे हो इंकार कर दोगे
दम तोड़ते अपने ही विचारों को
को पहिचानने से
नहीं नहीं सरदार तुम ऐसा नही
कर सकते
क्योंकि हमें उम्मीद है
तुम कल के सरदार की तरह
आज भी सरदार हो
जो फर्ज़ के लिए हमेशा डटा रहा
देश के एकत्रीकरण में ।
Tuesday, 30 October 2018
*****सरदार !*****
***** कभी नहीं ठहरता*****
कभी नहीं ठहरता
वक्त का घूमता पहिया
इसीलिए कभी नहीं ठहरती
धरती
और कभी नही ठहरता
आकाश
और नही ठहरते हैं
दिन और रात
यद्यपि लोग दावे
बहुत बड़े बड़े करते हैं
वक्त को रोकने के
पर ठहर नही पाते
उसकी गति' के सामने
या यूं कहें
नहीं रोक पाते
उसकी गति के सापेक्ष
अपने आप को
और इन सबसे से
अछूता वक्त तय करता है
अपने फासले
और बनाये रखता है
अपनी विश्वसनीयता
और पहिचान
******ढीठ लड़कियां******
कहाँ से आ जाती हैं
ये ढीठ लड़कियां
कभी पानी के बहाने
कभी नालिश के बहाने
बहुत ही उजड्ड है
यह लड़कियां
समझती नहीं संस्कारों को
थोड़ा बहुत होता तो चल जाता
पर बार बार आकर
प्रश्न पूंछती हैं
कुछ ऊल जुलूल से
जैसे प्रेम किसको समझे
धोखा किसको
कौन से कपड़े शालीन है
कौन से अशालीन
कैसे चलें ,कैसे बैठे ,कैसे बोले
क्या खाये क्या न खाए
कब बोले कब मौन रहे
आखिर कैसे जवाब दिया जा सकता है
इन बचकाने सवालों का
यह तो उफ !
वाली है बात
ढीठ लड़कियां
मांगने लगी हैं अपने अधिकार
करने लगी कोशिश
वह सब कुछ जानने की
जिसे अपनाकर प्राचीन काल से
आज तक हम करते आये हैं
उनके हकों का हरण
बात बात पर करती हैं
न्यायालय के आदेश की बात
आखिर कितनी ढीठ हो गई हैं
यह लड़कियां
Tuesday, 23 October 2018
***** अतीत के ज्वालामुखी*****
खत्म होने का नाम ही
नहीं लेती
तुम्हारी यादें
जब भी चाहता हूँ
लिखना
कोरे कागद पर
स्मृतियों के कुछ लफ्ज
ठहर जाती हैं कलम
और ठिठक जाता है
हौसला
ताजा हो जाती हैं
विस्मृत हो चुकी
इबारते
भरने लगता है
ऊहापोह युक्त मन में
उमंगों का लावा
और बेताव हो उठता है
फटने को
वर्तमान में खोया हुआ
अतीत का ज्वालामुखी
Friday, 12 October 2018
***** मुखर होने लगी है******
मुखर होते लगी है
सदियों से ओढी चुप्पियां
रात के घने अंधेरे में
ओढा दी गईं थी
सुबकती सिसकियों को
अभिमान था अपने पौरुष का
जिससे ढांक सकते हैं
रसूख की चादर से
खुद के कृत्य को
जिसे किसी भी तरह
नहीं कहा जा सकता
नैतिक
उन्हे खुद से भी अधिक
भरोसा था
अपनी बलवती सभ्यता पर
जिसने आदिम काल से
बख्श रखा है
अजेय शक्ति जिसके समक्ष
हमेशा से नतमस्तक होने को
विवश हैं स्त्रियां
रोने और बिसूरने की स्थिति
में प्रयोग किया जाता रहा है
कुलटा घोषित करने का भय
जिसकी आड़ में
हमेशा से फूलता और फलता रहा
स्त्री विमर्श का विटप
गली मुहल्ले राह चलते
प्रलोभनों की खेप के सहारे
घायल की जाती रहीं देवियां
समय बदल रहा
अपनी करवट
अब जवाब देना होगा
अहिल्याओ, सरस्वतियोंं,
सीताओं के स्थान पर
इन्द्रों,चन्द्रमाओं,गौतमों,ब्रहमाओं
और रामों को
अब वे बच नहीं सकते
नशे और द्यूत के नामों से
क्योंकि मुखर होने लगी हैं
सदियों से ओढी चुप्पियां
जो तुम्हारी चुनौतियों का
जवाब देने पर आमादा हैं
उन्हे और अधिक समय तक
रोक पाना
अब तनिक भी
नहीं रह गया है
तुम्हारे बस में
प्रद्युम्न कुमार सिंह
***** वर्जनाओं के विरुद्ध******
वर्जनाओं के
विरुद्ध
तनी हुई मुट्ठियों में
अभी भी बची हुई है
इतनी सामर्थ्य
कि भर सके
तुम्हारे विरुद्ध
हुंकार
और दर्ज करा सके
अपना प्रतिरोध
यद्यपि तुम्हारी अकड़न को
यह स्वीकार नहीं होगा
बावजूद इसके
भिची हुई चबुरियां और
तनी हुई मुट्ठियां
कर देगी तुम्हारे विरुद्ध
इकबाल बुलन्दी का
जयघोष
तुम्हारी क्रूरताएं चाहकर भी
रोक पाने में होंगी
असफल
हक के लिए बढते हुए कदम
अब फैसला तुम्हारे
हाथ में है
कि बचे हुए समय में
जमीनदोज होती
आस्मिताएं बचाने का
करते हो सफल प्रयास
या फिर घुट - घुटकर
दम तोड़ने के लिए
छोड़ देना चाहते हो उन्हे ।
प्रद्युम्न कुमार सिंह
***** हम तब्दील हो चुके है*****
हम तब्दील हो चुके हँ
खूंखार यांत्रिक
गिरोह मे
रक्षक से भक्षक
बन चुके हैं
अब हमारे शिकार
दुर्दान्त नहीं रहे
वरन् लक्ष्य बन चुके हैं
निरीह लोग
चाहकर भी मुमकिन नही
बदलना
क्योंकि अब हम इंसान
नहीं रहे
हमने अब स्वीकृत कर लिया है
कायराना कमांड
और समय समय पर करते हैं
बाखूबी इसका प्रयोग
क्योंकि हम तब्दील हो चुके हैं
रिमोट संचालित यांत्रिक
मशीनी गिरोह में
जिसे जरूरत होती है मात्र
एक अदद विद्युत तरंगीय
संकेत की
प्रद्युम्न कुमार सिंह