समकालीन कविता के स्तम्भ केदारनाथ सिह अलविदा -
नहीं भरे जा सकते
शून्य आयाम
नहीं ठहर सकते
गुजरे कल
नहीं लौट सकतीं
गर्म सांसे
नहीं आ सकते वापस
जाने वाले लोग
नहीं पलट सकते
नीरव में विलीन स्वर
बस यूँ ही
एक एक करके
दुनिया छोड़ चले
जाना है
रज से रूज तक
एक असीम शान्त स्वर
चिर परिचित
हंसी हंसता हैं
अपने ही अपने
संवेदन में
जो अभी भी रिक्त है
जिसे पूरित कर पाना
लगभग असम्भव है
.
Wednesday, 21 March 2018
*****नही भरे जा सकते****
***""रात कभी भी नही छोड़ती अंधेरे का साथ***
रात कभी भी नहीं छोड़ती
अंधेरे का साथ
कारण स्पष्ट है
रात्रि को रात्रि बनाता है
अंधेरा
क्योंकि उसकी
श्रीवृद्धि
उसी में निहित है
रात्रि का ही एक पड़ाव
होता है
प्रातःकाल
जिसमें रात्रि छोड़ने लगती है
अंधेरों का साथ
भ्रमरों के गुंजार के बहाने
खोजने लगती है
अलग आशियाना
और उषा की
किरण के साथ
खुद को परिवर्तित
कर देती है
दिन के सापेक्ष
जिससे बची रहें
उम्मीदें
और बचा रहे
अंधेरे का अस्तित्व ।
प्रद्युम्न कुमार सिंह
Saturday, 27 January 2018
****महानता का महन्त*****
सभ्य है
इसीलिए बर्बर हैं
असत्य को सत्य से
अधिक करते हैं
स्वीकार
इसीलिए
दिन बा दिन
उठता जा रहा है
भरोसा
सत्य और अहिंसा से
क्योंकि हमारी सहनशक्ति ने
बदल लिया है
अपना पाला
और जा टिकी है
असहनशीलता की शरण में
इसीलिए नफा नुकसान
उसे तुच्छ लगते हैं
उसे लगता है
उसके अतिरिक्त सभी
मूर्ख और डरपोक हैं
जिन्हे प्रतिवाद व प्रतिरोध से
लेना देना नहीं है
इसीलिए वे इतिहास को
बदलकर
बनाना चाहते हैं
भूगोल
जिसमें निरंकुशता
और आत्मश्लाधा
पार कर दे
आतंक की सारी हदें
और घोषित किया जा सके
उन्हे महानता का महन्त
जिससे प्रशस्त हो सके
उनके पूजे जाने का मार्ग
Friday, 1 December 2017
*****बहुत अच्छा लगता है*****
बहुत अच्छा लगता है
जब तुम करते हो
विकास की बातें
तुम्हारी बातों से
थरथराने लगतें हैं
पर्वत
गहराने लगता है
उजालों के बीच
अंधेरा
उदास हो जाती
सारी प्रकृति
चमक उठती हैं
तुम्हारी आंखों की पुतलियां
जोड़ देते हो
जब तुम
हर बात को अपनी
नकली भावनाओं से
और बजाने लगते हो
बात बात पर
अन्य पुरुषों सी तालियां
अपनी कुटिल चालों से
छीन लेते हो
पशुओं के रंभाने की
आवाजें
लहलहाते खेतों की
हरियाली
तुम ढांप देते हो
कंक्रीट के जंगलों से
गांवों नगरों के
सहज रास्ते
प्रदूषण के नये-नये
उपायों से
जिससे घुलता जाता है
पल प्रतिपल
श्वासों में
विषाक्त ज़हर
और महसूस होने लगता है
जीवन भार
इसके बावजूद भी तुम
तुम तुले हुए हो
विकास की भोथरी
बातों के भ्रम जाल को
फैलाने में
और सदा रहता है
तुम्हारा प्रयास
कि तुम्हारी बातों पर किया जाये
यकीन
जिससे तुम साध सको
आकाओं के हित ।
# प्रद्युम्न कुमार सिंह
Sunday, 19 November 2017
****वे बचकर निकलते हैं सकुशल****
इतने चतुर हैं वे
जो तलाश लेते हैं
दुर्गम और असुरक्षित
स्थानों पर भी
पहुँचने के लिए
सुविधाजनक रास्ता
उन्हें आभास है
चुटहिल होने की
पीड़ा का
वे समझते हैं
त्यौरियों की नज़ाकत
और उनकी हक़ीकत को
क्योंकि वे वाकिफ होते है
त्यौरियों के चढने और उतरने के
हुनर से
इसीलिए वे भाँप लेते है
समय से पूर्व संभावित खतरा
वे खुद को अलगा लेते हैं
खतरे से पहले
और बचकर निकलते हैं
सकुशल
Sunday, 5 November 2017
**** वे पिता ही थे*****
वे पिता ही थे
कभी भी नही कराते थे
जो एहसास
अपने जर्जर होने का
अपनी विवाइयों के दर्द
कई रातो के जागने की
व्यथा का
क्योंकि वे देखना चाहते थे
हमेशा ही
बच्चों को खुश
वे उनकी ही खुशी में
ढूंढ लेते थे
खुद की खुशी
उनकी चहकन में
भूल जाते थे
जीवन की फीकी होती
खुशियों की तासीर
वे नहीं चाहते थे
कभी भी उनका दर्द
जान सके उनके बच्चे
और उनकी खुशियों के क्षणों में
बन जाये बाधक
इसीलिए वे छिपाते थे
हमेशा ही अपने बच्चों से
अपना दर्द
Sunday, 17 September 2017
****ओ ऋषि ! सुनते हो****
ओ ऋषि !
सुनते हो
गुस्सा करना
ऋषि की फितरत नहीं है
अरजा !
तुम्हारी पुत्री थी
राजा दण्ड की
अदण्डता ही थी
अरजा के साथ उसने
दुराचार किया
ऋषि तुमने ठीक ही
किया
उसे दण्डित करके
आखिर मामला तुम्हारे सम्मान से
जुड़ा था
किसी ऐरे गैरे से जुड़ा होता तो
तुम भी निश्चित ही
हाथ बांधे खड़े मिलते
दण्ड के पक्ष में
और पिला रहे होते
नसीहतों की जड़ी बूटी
कभी छोटे कपड़ों की,
कभी समय की,
कभी चरित्र की
और बेचारी अरजा
विवश होती
नीचा मुख किये हुए
तुम्हारी ज्ञान भरी बातें
सुनने को
वह बेचारी तो
समझ भी न पाती कि
उसका अपराध
क्या हैं ?
उसके पाप क्या हैं ?
जिनके एवज में
कमतर पड़ गये
उसके पुण्य
पहली बार जब
तामड़ा और घूमर पर
थिरके थे उसके पांव
और हर्षित हुआ था
उसका मन
उसे पता ही नहीं था
उसकी यह खुशी अधिक
दिनों तक
स्थाई रहने वाली नही
एक दिन किसी अय्यास की
निगाह निहोरेगी
उसके तराशे
शरीर की मांसपेशियों को
और वह प्रयास करेगा
नोच कर खत्म कर दे
तुम्हारी अस्मिता
बन्धक बना लेगा वह
तुम्हारी स्त्री को
और करेगा अट्टहास
अपनी इस विजय पर
जिसे वह जीत सकता था
प्रेम से
किन्तु उसे तो
प्रेम से थी नफ़रत
छिटकते रहे टूट टूटकर
पायल के घुंघरू
बस्तर के आसपास
मद्धिम पड़ती रही
उनकी पीड़ा की खनक
लुटता रहा उनका
विश्वास
सुनकर कर भी
खौफ से मौन रहीं
नदियाँ
और मौन रहे पर्वत
दण्ड तुम्हारी उदण्डता ने
रच डाला
अपनी ही धरती का कैसा
भविष्य
ऋषि तुमने ठीक किया
जो दण्डित किया
उदण्डता और उसके पोषक
दण्ड को
शायद पहली बार तुमने
अपने ऋषि होने का उचित
फर्ज निबाहा था
गर्म ख़ून के आस्वाद को
रोकने का
शायद यह प्रथम प्रयास था
जब भोग को अधिकार
समझने को
अपराध मानकर किया गया था
दण्डित
ऋषि यह तुम्हारा ऋण
आज भी उधार है
धार के माथे पर
शायद पहली बार
किसी ऋषि का गुस्सा
आम जन की जगह फूटा था
समन्ती हठधर्मिता पर
कारण कुछ भी रहें हो
मामला तनुजा रही हो
या कोई और
ऋषि तुमने पहली बार
फूंका था बस्तर की धरती में
बगावत का बिगुल
और लगाया था हरे घावों पर
मरहम
हे ऋषि एक बार फिर से
महसूस हुई है तुम्हारी जोरदार
जरूरत
देख रहा है युग तुम्हारी ओर
आशा भरी निगाहों से
आओ फिर युग पुरुष
और निभाओ अपना फर्ज
देकर दण्ड को दण्ड