Friday, 1 December 2017

*****बहुत अच्छा लगता है*****

बहुत अच्छा लगता है
जब तुम करते हो
विकास की बातें
तुम्हारी बातों से
थरथराने लगतें हैं
पर्वत
गहराने लगता है
उजालों के बीच
अंधेरा
उदास हो जाती
सारी प्रकृति
चमक उठती हैं
तुम्हारी आंखों की पुतलियां
जोड़ देते हो
जब तुम
हर बात को अपनी
नकली भावनाओं से
और बजाने लगते हो
बात बात पर
अन्य पुरुषों सी तालियां
अपनी कुटिल चालों से
छीन लेते हो
पशुओं के रंभाने की
आवाजें
लहलहाते खेतों की
हरियाली
तुम ढांप देते हो
कंक्रीट के जंगलों से
गांवों नगरों के
सहज रास्ते
प्रदूषण के नये-नये
उपायों से
जिससे घुलता जाता है
पल प्रतिपल
श्वासों में
विषाक्त ज़हर
और महसूस होने लगता है
जीवन भार
इसके बावजूद भी तुम
तुम तुले हुए  हो
विकास की भोथरी
बातों के भ्रम जाल को
फैलाने में
और सदा रहता है
तुम्हारा प्रयास
कि तुम्हारी बातों पर किया जाये
यकीन
जिससे तुम साध सको
आकाओं के हित ।

# प्रद्युम्न कुमार सिंह

Sunday, 19 November 2017

****वे बचकर निकलते हैं सकुशल****

इतने चतुर हैं वे
जो तलाश लेते हैं
दुर्गम और असुरक्षित
स्थानों पर भी
पहुँचने के लिए
सुविधाजनक रास्ता
उन्हें आभास है
चुटहिल होने की
पीड़ा का
वे समझते हैं
त्यौरियों की नज़ाकत
और उनकी हक़ीकत को
क्योंकि वे वाकिफ होते है
त्यौरियों के चढने और उतरने के
हुनर से
इसीलिए वे भाँप लेते है
समय से पूर्व संभावित खतरा
वे खुद को अलगा लेते हैं
खतरे से पहले
और बचकर निकलते हैं
सकुशल

Sunday, 5 November 2017

**** वे पिता ही थे*****

वे पिता ही थे
कभी भी नही कराते थे
जो एहसास
अपने जर्जर होने का
अपनी विवाइयों के दर्द
कई रातो के जागने की
व्यथा का
क्योंकि वे देखना चाहते थे
हमेशा ही
बच्चों को खुश
वे उनकी ही खुशी में
ढूंढ लेते थे
खुद की खुशी
उनकी चहकन में
भूल जाते थे
जीवन की फीकी होती
खुशियों की तासीर
वे नहीं चाहते थे
कभी भी उनका दर्द
जान सके उनके बच्चे
और उनकी खुशियों के क्षणों में
बन जाये बाधक
इसीलिए वे छिपाते थे
हमेशा ही अपने बच्चों से
अपना दर्द

Sunday, 17 September 2017

****ओ ऋषि ! सुनते हो****

ओ ऋषि !
सुनते हो
गुस्सा करना
ऋषि की फितरत नहीं है
अरजा !
तुम्हारी पुत्री  थी
राजा दण्ड की
अदण्डता ही थी
अरजा के साथ उसने
दुराचार किया
ऋषि तुमने ठीक ही
किया
उसे दण्डित करके
आखिर मामला तुम्हारे सम्मान से
जुड़ा था
किसी ऐरे गैरे से जुड़ा होता तो
तुम भी निश्चित ही
हाथ बांधे खड़े मिलते
दण्ड के पक्ष में
और पिला रहे होते
नसीहतों की जड़ी बूटी
कभी छोटे कपड़ों की,
कभी समय की,
कभी चरित्र की
और बेचारी अरजा
विवश होती
नीचा मुख किये हुए
तुम्हारी ज्ञान भरी बातें
सुनने को
वह बेचारी तो
समझ भी न पाती कि
उसका अपराध
क्या हैं ?
उसके पाप क्या हैं ?
जिनके एवज में
कमतर पड़ गये
उसके पुण्य
पहली बार जब
तामड़ा और  घूमर पर
थिरके थे उसके पांव
और हर्षित हुआ था
उसका मन
उसे पता ही नहीं था
उसकी यह खुशी अधिक
दिनों तक
स्थाई रहने वाली नही
एक दिन किसी अय्यास की
निगाह निहोरेगी
उसके तराशे
शरीर की मांसपेशियों को
और वह प्रयास करेगा
नोच कर खत्म कर दे
तुम्हारी अस्मिता
बन्धक बना लेगा वह
तुम्हारी स्त्री को
और करेगा अट्टहास
अपनी इस विजय पर
जिसे वह जीत सकता था
प्रेम से
किन्तु उसे तो 
प्रेम से थी नफ़रत
छिटकते रहे टूट टूटकर
पायल के घुंघरू
बस्तर के आसपास
मद्धिम पड़ती रही
उनकी पीड़ा की खनक
लुटता रहा उनका
विश्वास
सुनकर कर भी
खौफ से मौन रहीं
नदियाँ
और मौन रहे पर्वत
दण्ड तुम्हारी उदण्डता ने
रच डाला
अपनी ही धरती का कैसा
भविष्य
ऋषि तुमने ठीक किया
जो दण्डित किया
उदण्डता और उसके पोषक
दण्ड को
शायद पहली बार तुमने
अपने ऋषि होने का उचित
फर्ज निबाहा था
गर्म ख़ून के आस्वाद  को
रोकने का
शायद यह प्रथम प्रयास था
जब भोग को अधिकार
समझने को
अपराध मानकर किया गया था
दण्डित
ऋषि यह तुम्हारा ऋण
आज भी उधार है
धार के माथे पर
शायद पहली बार
किसी ऋषि का गुस्सा
आम जन की जगह फूटा था
समन्ती हठधर्मिता पर
कारण कुछ भी रहें हो
मामला तनुजा रही हो
या कोई और 
ऋषि तुमने पहली बार
फूंका था बस्तर की धरती में
बगावत का बिगुल
और लगाया था हरे घावों पर
मरहम
हे ऋषि एक बार फिर से
महसूस हुई है तुम्हारी जोरदार
जरूरत
देख रहा है युग तुम्हारी ओर
आशा भरी निगाहों से
आओ फिर युग पुरुष
और निभाओ अपना फर्ज
देकर दण्ड को दण्ड

Saturday, 16 September 2017

****यशोधरा*****

यशोधरा !
तुमको पढाया गया
पति परमेश्वर की सेवा का पाठ
जैसे पढ़ाया जाता है
एक बच्चे को
कलम और कागज के
रिश्ते की कहानी
खेलने कूदने से अधिक
कपड़ों की हिफ़ाजत के
तौर तरीके
जिससे रखा जा सके उन्हे
अधिक समय तक
स्वच्छ और साफ
तुम्हे हमेशा से
देखा जाता रहा है
कोफ्त निगाहों से
जैसे देखे जाते हैं
दुर्दिन में आकाशीय बादल
जिनकी वीभत्स गड़गड़ाहट के बीच
पनपती हैं
बहुत से आशंकाएं
उनके चाल चरित्र को लेकर
हमेशा से तुम्हे समझा गया
मात्र भोग की वस्तु
जो केवल जानती है
आज्ञा पालन की बात
लौटा दी जाती रही
तुम्हारी वेदनाएं
जमाने की फौलादी
दीवारों से
मानव कल्याण के नाम पर
तुम रही हमेशा शान्त
और प्रतिरोध रहित
क्योंकि तुम्हे अभी भी
उम्मीद थी
स्त्री जीवन का मतलब
छीनना नहीं होता
अपितु होता है
समाज को कुछ देना
तुम करती रही अपने साथ
हमेशा छल
इसीलिए कभी भी नही
जुटा सकी
प्रतिबद्धताओं से मुकरने का
का साहस
और ना ही समझा पाई
अपनी असहमतियों के
पीड़ायुक्त भाव
तुम आज भी
देखी जाती हो तन्मयता के साथ
उसी वेश में
दूर जलती हुई आग के
साथ
तुम आज भी नहीं बता पाई 
अपनी अनहद
बल्कि सिमटी रही शालीन
भाषा सी
नियमों उपनियमों के
बन्धन में
खुद को बचाये रखने की
जद्दोजहद में
अब भी तुम बचाये हुए हो
एक अदृश्य आधार
जिसके.इर्दगिर्द
आज भी घूमते हैं
तुम्हारे करुण स्वर
जिन्हें हमेशा की तरह
एक बार फिर से
कर जायेगा
अनसुना
यशोधरा !
कैसी स्त्री हो तुम
रोक नहीं पाई जो
पति प्रयाण
कहां चूक गये तुम्हारे वे
तीक्ष्ण हथियार
जिनके प्रभाव से
घोर तपस्या में रत
यति मुनि भी छोड़ देते थे
तप का विचार
यशोधरा !
निश्चित रूप से तुम्हे करना होगा
पुनः मन्थन अपने
स्त्रीत्व का
कैसे और कहाँ पड़ गई
तुम कमजोर ?
जबकि तुमसे ताकतवर
निकली
बेजान वीणा
जो खींच ले गई शौतन की तरह
तुमसे तुम्हारा सिद्धार्थ
कहो कहो यशोधरा
कहीं ऐसा तो नहीं !
ऊब चुका हो तुमसे
तुम्हारा पुरुष
तुम्हे शीघ्र करनी होगी
इसकी पड़ताल
तुम्हे जानने होंगे
सिद्धार्थ के मुख मोड़ने के
वास्तविक कारण
जिसके कारण एक झटके में
उसने तोड़ दिया
युगों युगों का तुम्हारा
विश्वास
यशोधरा !
कहीं ऐसा तो नहीं
तुम्हारे स्त्रीत्व से हार गया हो
सिद्धार्थ
और छिपाने को अपनी
हिकारत
मोड़ लिया हो खुद से ही
खुद का मुख
जिससे बची रहे
उसकी झूठी शान
और बचा रहे उसका
डिगा ईंमान
यशोधरा कुछ तो बोलो
दुनिया की आंखों में पड़े
राज से पर्दा उठाओ
क्योंकि तुम्हारी चुप्पी ही
प्रबल बनाती है सैकड़ो बुद्ध
और प्रताड़ित करती है
स्त्रीत्व को
जिसकी आड़ में आज भी 
ढूढ़ लेते है संयास का
सुरक्षित बहाना
और थोप देते हैं
यशोधरा के सर पर
अनन्त काल तक चलने वाली
चुप्पी
यशोधरा !
शायद तुम्हारी चुप्पी में ही
छुपे हैं
सिद्धार्थ के बुद्ध बनने के
बीज
नहीं तो कब का धराशायी हो गया होता
बुद्ध और उसका कुनबा ।
         प्रद्युम्न कुमार सिह

Thursday, 14 September 2017

****प्रात पवन*****

प्रात पवन के साथ
खुल रही थी
आँखों के पास आँख
ऊंघते बागों में
खिल थी प्रात की धूप
खत्म हुई
चाँद की चाँद मारी
सिमट गये हैं भूतों के डेरे
लूट गई वह कैसे
जीवन की स्वर्णिम
बेला
कलम की रफ़तार में
हनक के बीच
घुट रहा था जीवन का संगीत
सुलझन और उलझन
की गठरी बांधे
घूम रहा वह गली गली
तरस रहा था वह विश्वास के
एक अदद को
आँखों के पास
खुल रही थी आँख

*****भेद रहा था****

भेद रहा था
खग कुल का
कलरव
भूतल का नीरव तल
खोज रहा धान्य के
अवशेष
क्षुधा मिटाने को सप्रयास
तृषित नैनों की
मद्धिम ज्योति मे
घुलती थी आदिम भूख
कोटरों के कोनों से
किलकित नव उत्साह
बुन रहा था स्वप्न नये
तम आलोकित जगती का
भाल
भरता था उनमे
जीवन का भार
झर रही थी स्वप्निल धूप
खिल रहीं थी जिसमे
बचपन की सुरभि
सोये थे जिसमें अनन्त विचार
इसी से व्यग्र था
उसका मन
खैर ख्वाब की बातों में डूबा
पहुँच गया कब वह
क्षितिज के पार
सूरज ढलने से पहले
चिन्ता थी शेष एकमात्र
गा रहा था अब भी
उसका हुलसित मन
धंसा हुआ
जीवन संघर्षों के बीच