Sunday, 9 January 2022

मुझे फख्र है

मुझे फ़ख्र है
मैं कभी नही बन सका 
महानायक 
भव्यता और भ्रम के
शानदार उपमानों से 
घिरा हुआ
कथनी तथा करनी में 
अन्तर के पैमाने तय 
करता हुआ
रौब और दौव के साथ
चमचमाती कारों मे सवार
कैमरों के सामने 
झूठी मुस्कान सहेजता हुआ
बल्कि मै लड़ता रहा 
लगातार 
संघर्षशील मनुष्य की 
आवाज बनकर
अन्याय व अत्याचार के 
विरुद्ध उद्घोष बन
यद्यपि नहीं दिला सका मैं
उत्पादकों को
उनकी लागत से 
अधिक कीमत
और विफल रहा
आधी आबादी के संघर्ष को
सरोकारों तक पहुँचाने मे 
फिर भी मुझे फ़ख्र है
मैं कभी नही बन सका 
महानायक 
जो आदमी होते हुए भी
हमेशा रहता हो
आदमियत की जद से 
बाहर
बल्कि इसके विपरीत
मै लगा रहा हमेशा
जन भावनाओं के साथ
मन क्रम वचन से
प्रतिबद्ध योद्धा सरीखा
यद्यपि मुझे भुगतने पड़े 
इसके गम्भीर परिणाम भी
परन्तु मैं खुश था
प्रकृति व परिस्थितियों के साथ 
तदात्म स्थापित करते हुए
क्योंकि मेरे लिए 
महानायकत्व से भी 
महत्वपूर्ण थी
मनुष्यों की संवेदना
जो पहुँचती जा रही है
लगातार खात्मे की ओर

Saturday, 25 December 2021

कृषक पर आधारितगोलेन्द्र ग्यान के पेज पर प्रकाशित दो रचनाएं

45).
मैं किसान हूँ / प्रद्युम्न कुमार सिंह

मैं किसान हूँ
सदा उम्मीदों के 
बीज बोता हूँ
भूमि कैसी भी हो
पथरीली हो,
बंजर हो, 
ऊसर हो 
या फिर दलदली हो
मैं उस पर 
एक उम्मीद रोपता हूँ
बादलों की बेरूखी हो
या फिर अपनों की 
बेगैरियत
मैं खामोश रहते हुए
अपनी भूमि जोतता हूँ
हरियाली देख झूमता हूँ
नुकसान होते हुए 
देखकर भी
विचलन से दूर रह
आशाओं भरी 
उम्मीदो के सहारे 
जिन्दगी को जीता हूँ
साहब मैं एक किसान हूँ
जब तक मेरी फसलें 
रहती हैं असुरक्षित 
मैं चैन से नही सोता हूँ 
तूफान हो, 
ओले पड़े 
या फिर भीषण गर्मी की 
लुआर हो
मैं उद्यत रहता हूँ 
सदा उनसे जूझने के लिए
क्योंकि मैं बोता हूँ
धरती के सीने को चीरकर
उसे शस्य श्यामला 
बनाने वाले उन्नत बीजों को

46).
उस दिन / प्रद्युम्न कुमार सिंह

उस दिन
मैं देखता रहा था
तुम्हें इकटक
क्योंकि मुझे उम्मीद थी
तुम उठ आओगे
अचानक
अपने वियावन से
उभरते हुए दृश्य चित्रों की तरह
पर ऐसा नहीं
हो सका
क्योंकि तुम कोई 
दृश्य नहीं थे
जो उभर आते
आँखों की कोरों के बीच
अनायास

मैं प्रतीक्षा करता रहा था
बहुत क्षणों तक
कि तुम सुन सको
शायद मेरी आवाज में
बोले गये शब्दों को
पर तुम नहीं सुन सके
क्योंकि तुम कोई 
श्रव्ययन्त्र नहीं थे
जो सुनते बोले हुए 
शब्दों को
मेरी सोच और विश्वास
दोनो परिवर्तित हो
चुके थे जड़ में
जिनमे देखने और सुनने
की क्षमता पूरी तरह से 
खत्म हो चुकी थी

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◆कविता-45,46

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Monday, 13 December 2021

यह आवश्यक तो नही

यह आवश्यक तो नही 
जिससे मुहब्बत हो 
उससे बयाँ ही की जाय
एक झलक भी बुन देती है 
हजार ताने बाने 
और एक कसक सताती रहती है
ओझल हो हो

ठगे जाते है

ठगे जाते हैं
शातिरों के हाथ सदैव से
मासूम लोग 
कभी नहीं कह पाते वे 
अपनी पीड़ा को
क्योंकि उन्हे विश्वास होता है
एक दिन समझ जायेंगे लोग उन्हे
और वे चुप रहते हैं

ठगे जाते हैं
शातिरों के हाथ सदैव से
मासूम लोग 
क्योंकि वे मानते हैं 
यह अन्तिम ठगी है
इसीलिए वे सह लेते हैं
उसे हंसते हुए
और आगे बढ़ जाते हैं
सकारात्मकता की प्रत्यासा में

ठगे जाते हैं
शातिरों के हाथ सदैव से
मासूम लोग 
क्योंकि उनको उम्मीद आशावान होती है
ढोये जाते रिश्तों में बची हुई
मानवीयता के प्रति
और वे सहज हो जाते हैं
आश्वस्तियों के सहारे 

ठगे जाते हैं
शातिरों के हाथ सदैव से
मासूम लोग 
फिर भी वे थामे रहते हैं अन्त तक 
धूमिल पड़ती पगडण्डियों की बाहें
क्योंकि उनका मन अब भी होता है
आइने जैसा साफ सुथरा
जिसमे आकर बाधाएं 
खुद ब खुद होती है शर्मिंदा
जबकि जश्न मनाता है 
ठग और उनका पूरा गिरोह 
अपनी खोखली जीत पर
जिसे बहुत कम ही लोग
पाते हैं समझ।

ठगे जाते हैं
शातिरों के हाथ सदैव से
मासूम लोग 
वे स्वीकार लेते हैं देर सबेर 
अपनी ठगी को
और चल पड़ते हैं 
अनाहत धारा सरीखे 
अप्रतिहत शक्ति के साथ
जबकि ठग और उनका कुनबा
भोगता है अपना द्वारा कृत 
कृत्यों का परिणाम
और चाहकर भी नहीं कह पाता
किसी से भी।

Sunday, 7 November 2021

इतवार की सुबह

बिल्कुल !
अलग तरह की होती है
इतवार की सुबह
रोज की भागमभाग से मुक्त
यद्यपि इस दिन भी
सूरज निकलता है
फूल खिलते है
भौंरे गुनगुन करते हैं
फूलों पर तितलियाँ मड़राती है
पक्षी भी एक दरख्त से 
दूसरे दरख्त तक
अपने स्वर निकालते हुए
सहजता से
आते और जाते हैं
मैं देखता हूँ जब भी
खिलखिलाते हुए 
मासूम से बच्चों को
रोक नहीं पाता हूँ 
खुद को
सोचने लगता हूँ
काशः कभी न खत्म हो
यह कल्पनाओं की सुबह 
जो अभी अभी 
ओस कणों से धुलकर 
तरोताजा हो
खेलने को आई है
इन ठहठहाते बच्चों के साथ
जिसके आने की सूचना
नन्ही गिलहरियों के
छोटे छोटे बच्चे
उत्सुकता से दौड़ते हुए
खेलते हुए इन नौनिहालों को 
देना चाहते हैं
इसीलिए वे लगातार 
इधर से उधर 
लगाए हुए हैं दौड़
पर बच्चे मस्त हैं 
अपने आप में
वे ध्यान नहीं दे रहें हैं
उनकी ओर
पर मुझे खींच रहा है
उनका यह आकर्षण
जो मिलता जा रहा है 
धीरे धीरे
सुबह की खिलती हुई धूप में
इतवार की भाँति
बिल्कुल अलग तरह से

Sunday, 10 October 2021

वे पहाड़ थे

वे पहाड़ जैसे ही थे 
प्रवाहित होती थी 
जिनसे असीम 
वेदनाओं को
सहेजे हुए 
निर्झरिणी सी नदियां
फूटते थे जिनसे
बहुत से झरनों के उत्स
सिंचित करती थीं जो 
आतृप्त मैदानों को
अपने संतृप्त जल से
नवजीवन का संचार करती थी
जंगलों के पौधों 
व जीव जन्तुओं के मध्य
उन्ही के साथ 
प्रेम के कच्चे धागों में 
बंधे हुए 
कष्टो और पीड़ाओं को 
परवाह न करते हुए
बहे चले आते थे
स्नेहसिक्त बन्धुओं की भाँति
कुछ बलुआ पत्थर
जो करते थे उन्हे रोकने के 
हर सम्भव प्रयास
और एकत्रित हो जाते थे
खुद को नन्हे नन्हे
कणों में विभक्त करके
किन्तु नदियो के थे
उससे भी बड़े उद्देश्य
पहुँचना चाहती थीं
जो हर उस जगह तक
आवश्यकता थी जहाँ पर उनकी
यद्यपि वे पहुँची भी
यथा सम्भव उन जगहों तक
और हरा भरा भी बनाया
किन्तु इसके बाद भी 
रह गये 
बहुत से स्थल 
उनके प्रेम से बंचित 
जो अब भी बने हुए हैं
पाषाणों से रुक्ष और कठोर ।

Monday, 4 October 2021

खूँटियों में टंगे हुए लोग

लोग टंगे हुए हुए
खूंटियों में
धरती तक नहीं
पहुंच पाते उनके पाँव
न ही पहुँच पाती हैं
उनकी अपेक्षाएं
यदि उन तक पहुंचाने होते हैं
कोई संदेश
तो उन्हे उतारना पड़ता है
खूंटियों से
जो आसान नहीं होता है
इसीलिए तुम्हे बचना चाहिए
संदेशों व सम्भावनाओं से
तब ही तुम 
समझ सकते हो
खूंटी और धरती के बीच
छूटी हुई रिक्तता को
जो सीधे प्रभावित होती है
खूंटी में टंगे हुए 
लोगों के विचारों 
तथा भावनाओं से
तुम समझ सकते हो
पृथ्वी को 
जो स्पष्ट रूप से
टंगी रहती है सदैव
आश्वस्तियों की 
मज़बूती के साथ
खूंटियों मे टंगे हुए
लोगों की भाँति
सदैव तुम्हारे सामने
प्रश्न बढ रहे जितने
घट रहे उतने ही 
उनके जवाब
खूँटियों पर टँगे हुए 
आदमी
क्या खूंटियों में ही 
टँगे रहेंगे हमेशा के लिए
या फिर कभी 
उतरेंगे भी खूँटियों से