Sunday, 7 November 2021

इतवार की सुबह

बिल्कुल !
अलग तरह की होती है
इतवार की सुबह
रोज की भागमभाग से मुक्त
यद्यपि इस दिन भी
सूरज निकलता है
फूल खिलते है
भौंरे गुनगुन करते हैं
फूलों पर तितलियाँ मड़राती है
पक्षी भी एक दरख्त से 
दूसरे दरख्त तक
अपने स्वर निकालते हुए
सहजता से
आते और जाते हैं
मैं देखता हूँ जब भी
खिलखिलाते हुए 
मासूम से बच्चों को
रोक नहीं पाता हूँ 
खुद को
सोचने लगता हूँ
काशः कभी न खत्म हो
यह कल्पनाओं की सुबह 
जो अभी अभी 
ओस कणों से धुलकर 
तरोताजा हो
खेलने को आई है
इन ठहठहाते बच्चों के साथ
जिसके आने की सूचना
नन्ही गिलहरियों के
छोटे छोटे बच्चे
उत्सुकता से दौड़ते हुए
खेलते हुए इन नौनिहालों को 
देना चाहते हैं
इसीलिए वे लगातार 
इधर से उधर 
लगाए हुए हैं दौड़
पर बच्चे मस्त हैं 
अपने आप में
वे ध्यान नहीं दे रहें हैं
उनकी ओर
पर मुझे खींच रहा है
उनका यह आकर्षण
जो मिलता जा रहा है 
धीरे धीरे
सुबह की खिलती हुई धूप में
इतवार की भाँति
बिल्कुल अलग तरह से

Sunday, 10 October 2021

वे पहाड़ थे

वे पहाड़ जैसे ही थे 
प्रवाहित होती थी 
जिनसे असीम 
वेदनाओं को
सहेजे हुए 
निर्झरिणी सी नदियां
फूटते थे जिनसे
बहुत से झरनों के उत्स
सिंचित करती थीं जो 
आतृप्त मैदानों को
अपने संतृप्त जल से
नवजीवन का संचार करती थी
जंगलों के पौधों 
व जीव जन्तुओं के मध्य
उन्ही के साथ 
प्रेम के कच्चे धागों में 
बंधे हुए 
कष्टो और पीड़ाओं को 
परवाह न करते हुए
बहे चले आते थे
स्नेहसिक्त बन्धुओं की भाँति
कुछ बलुआ पत्थर
जो करते थे उन्हे रोकने के 
हर सम्भव प्रयास
और एकत्रित हो जाते थे
खुद को नन्हे नन्हे
कणों में विभक्त करके
किन्तु नदियो के थे
उससे भी बड़े उद्देश्य
पहुँचना चाहती थीं
जो हर उस जगह तक
आवश्यकता थी जहाँ पर उनकी
यद्यपि वे पहुँची भी
यथा सम्भव उन जगहों तक
और हरा भरा भी बनाया
किन्तु इसके बाद भी 
रह गये 
बहुत से स्थल 
उनके प्रेम से बंचित 
जो अब भी बने हुए हैं
पाषाणों से रुक्ष और कठोर ।

Monday, 4 October 2021

खूँटियों में टंगे हुए लोग

लोग टंगे हुए हुए
खूंटियों में
धरती तक नहीं
पहुंच पाते उनके पाँव
न ही पहुँच पाती हैं
उनकी अपेक्षाएं
यदि उन तक पहुंचाने होते हैं
कोई संदेश
तो उन्हे उतारना पड़ता है
खूंटियों से
जो आसान नहीं होता है
इसीलिए तुम्हे बचना चाहिए
संदेशों व सम्भावनाओं से
तब ही तुम 
समझ सकते हो
खूंटी और धरती के बीच
छूटी हुई रिक्तता को
जो सीधे प्रभावित होती है
खूंटी में टंगे हुए 
लोगों के विचारों 
तथा भावनाओं से
तुम समझ सकते हो
पृथ्वी को 
जो स्पष्ट रूप से
टंगी रहती है सदैव
आश्वस्तियों की 
मज़बूती के साथ
खूंटियों मे टंगे हुए
लोगों की भाँति
सदैव तुम्हारे सामने
प्रश्न बढ रहे जितने
घट रहे उतने ही 
उनके जवाब
खूँटियों पर टँगे हुए 
आदमी
क्या खूंटियों में ही 
टँगे रहेंगे हमेशा के लिए
या फिर कभी 
उतरेंगे भी खूँटियों से

Sunday, 19 September 2021

ये जो कंगूरे

ये जो कंगूरे 
इतरा रहे हैं
खुद के रंग ओ रुआब पर
वे तही जानते
अपनी खूबसूरती का राज
जो बनी हुई है
नींव की ईटों के समर्पण की 
प्रवृति पर
पर कंगूरो की गर्जना के स्वर 
आज भी कराते हैं एहसास
अधिक समर्पण हमेशा
सही नहीं होता
जैसा कि नींव की ईटों ने
कर रखा है
यदि बनी रहती उनकी भी ऐठन 
पहले जैसी तो
कंगूरों का अप्तित्व दिखता
हिलता डुलते पेण्डुलम की तरह
और उनकी अकड़ छोड़ जाती 
कब की उनका साथ 
जिसके भरोसे वे गाँठते है
अपना रुआब I

Thursday, 16 September 2021

तुम्हारी आँखों में

तुम्हारी आँखों में तैरते हैं
बहुत से हसीन सपने
बहुत सी अनछुई स्मृतियाँ
बहुत से सहमें हुए एहसास
और सामाजिक सरोकारों से सम्बन्धित 
बहुत सम्भावनाएं
जो कुरेदते हैं
तुम्हारी चेतना और अन्तःकरण को
फिर भी तुम बोलते हो
नहीं फटकते सपने मेरे पास 
मेरी आंखों की पुतरियों में
नींद के अतिरिक्त नहीं होती
किसी वस्तु के लिए कोई जगह 
शायद तुम भूल जाते हो
तुम्हारा एक झूठ
घोषित कर देगा तुम्हारे चरित्र को 
दोयम दर्जे का

Monday, 6 September 2021

यार तुम डरते हो

वे डरते हैं
शब्दो के तीखेपन से
जैसे डरता है
मेमना
डरता है भेड़िया
और डरता है 
बनराज
वन में बढ रही 
आवाजाही से
वृक्षो की कटान से
वीरान होते 
वन
गाद से खत्म होती 
नदी
विकास से आस्तित्व 
खोते पहाड़
कंकरीट के फैलते जंगलों से
उजड़ती धरती
वे भी डरते हैं
शब्दों के तीखेपन से

वे डरते हैं

वे डरते हैं
शब्दो के तीखेपन से
जैसे डरता है
मेमना
डरता है भेड़िया
और डरता है 
बनराज
वन में बढ रही 
आवाजाही से
वृक्षो की कटान से
वीरान होते 
वन
गाद से खत्म होती 
नदी
विकास से आस्तित्व 
खोते पहाड़
कंकरीट के फैलते जंगलों से
उजड़ती धरती
वे भी डरते हैं
शब्दों के तीखेपन से