Monday, 30 August 2021

कवि तुम लिखो

कवि ।
तुम लिखो कविता
तोड़े जाते हुए नन्ही चिड़ियों के
मज़बूत डैनों के खिलाफ
तुम्हारे शब्द करे
मरहम-पट्टी
रिसते जख्मों की
तुम !
साधो छन्दों अलंकार से युक्त
सजीली भाषा के तीर
जिससे भेद सको 
मृत भूख के ढहते किले
तुम्हारे नाद बहा दें
सतत वाहनी नदी सी 
रसधार 
हे कवि !
लिखो मिल सके जिससे
किसी बेसहारा असहाय को
दृढ आधार
तुम लिखो दर्द के खिलाफ 
जिन्दा हो सके जिससे
मृत आंखों का पानी
रहनुमाई करती कविता
कवि ! 
तुम शब्दों की ध्वन्यात्मकता
के साथ 
साधो ऐसे संधान
अभाव में जीने को मजबूर 
बच्चाें की अनगूंज
तुम!
खोजो ऐसे हर्फ
पसीज सके जिससे कुलिश सा 
कठोर कलेजा
तुम्हारे प्रत्येक शब्द 
में हो एक कसक
कर्ज में डूबे
मजदूर व किसान के दर्द की
कवि ।
तुम्हारे शब्दों में हो एक ललकार
चेहरे की झुर्रियाँ के विरुद्ध 
तुम्हारी खामोश लफ़्ज 
भर दे
सूख चुके गालों में
सुर्ख लाल रंग 
कवि ! स्मरण रहे 
तुम्हारे शब्दों की
हुंकार जारी रहनी चाहिए
कविता के कविता होने तक ।

उम्र के साथ

उम्र के साथ !
गहरी होती जाती हैं
माथे में
चिन्ता की लकीरें
घटती जाती हैं
रिश्तों के बीच घुली
मिठास 
और बढ़ते चले जातें हैं
तन से मन के दरमियान
फासले
पनपने लगते हैं 
आशाओं के बीच 
निराशा के बहुत से भाव
घेर लेते हैं 
खुशियों का स्थान 
अवसाद
थमने लगती है
चाहत की पींगों की रफ्तार
बावजूद इसके मन करता है 
कि वह लगातार करे
अनाहत कोशिशें
समय के साथ तदात्म 
स्थापित करने की

Tuesday, 3 August 2021

स्मृतियों में

काले काले बादल 
जब उमड़ घुमड़कर
कराते हैं रात भर अपनी
अमृतमयी बूँदों से
शीतलता का एहसास
झूम उठते हैं
मुरझाये हुए पौधों के चेहरे
खिल उठती हैं कलियाँ
झूम उठते हैं नव किसलय
मुझे याद आता है
अपना वह बचपन और वे दोस्त
निकल जाता था 
अल सुबह जिनके साथ
सुबह की नम व गीली मिट्टी में 
खेलने के लिए
रम्भाने लगते थे जब 
पालतू पशु
भर जाता था टर्र टर्र की 
बेनामी आवाज से
प्रकृति का आँगन
लरजने लगता था आकाश
गीले जेवड़े और गीले खूँटो में
चरपटाने लगते थे दुधारू जानवर
बाँध देते थे जिन्हे 
घर के बुर्जुग
गीले खूँटे से ढीलकर 
दूसरे कम गीले खूँटे पर 
तभी बछड़े के से साथ 
बाल्टी लेकर दूध दुहने 
आ जाती थी माँ
और दुह लेती थी सहजता के साथ
दोहनी भर का दूध
जिसे लेकर चले जाते थे
घर के दूसरे लोग
घर में उधम मचाते थे 
स्कूल जाने को उत्सुक 
छोटे बच्चे
बाडे का काम निबटाकर
स्नान ध्यान कर वापस लौटी माँ
आग डाल सुलगा देती थी चूल्हा
तभी फूँकनी चीमटे 
तथा तावे को लेकर आ जाती थी 
घर की छोटी बच्ची
और करने लगती थी
रसोई बनाने की जिद
बडे दुलार से उसे पुचकार 
लगाती थी माँ
आटे की नन्ही लोई देकर
उसे साध लेती थी माँ
इस तरह चलता रहता है
अनवरत यह क्रम
यद्यपि बदलती रहती हैं 
बारी बारी से समय की सभी ऋतुएं 
पर नहीं बदलता तो
स्मृतियों में सतत चलने 
वाला यह क्रम ।

Tuesday, 4 May 2021

लोग मर रहे थे

लोग मर रहे थे हाँफते 
महामारी के प्रकोप से
वह हाँकता रहा
अपनी यश गाथा की 
किंवदन्तियां
थमती गई उखड़ती हुई 
तमाम सांसे
पर अलमस्त खोया रहा वह
अपने नकारेपन के मद
लाचार हो देखते रहे लोग
श्मशान घाटों के
धू धू जलती बेतरतीब लाशों के 
वीभत्स दृश्य
लेकिन वह परोसता रहा
संख्याओं के जादूई आकड़े
बढ़ती जा रहीं थीं 
लगातार जोर की आँधियां
बुझते जा रहे थे 
एक एक करके जलते हुए 
सभी चिराग
विलीन होता जा रहा 
धीरे धीरे गहन तम में
उजाले का आबाद शहर
बढ़ती जा रहीं थीं 
हमारे आसपास 
डरावनी आवाजों की 
सुगबुगाहाटें
बावजूद इसके कायम था
अब भी उस पर भरोसा 
इसी से वे उसे खोजते रहे 
जख्मी वेदनाओं के इर्द-गिर्द
पर वो तो व्यस्त था
निस्पृह साधकों सा 
खुद का हुनर निखारने में
वह प्रसन्न था अपनी
कलाबाजियों के भोड़े प्रदर्शन में
तथा हँस रहा था 
ठट्ठा मारकर हो रही मौतों पर
और हम बिवश व लाचार थे
अपना ही तमाशा देखने के लिए
यह कोई पहली दफ़ा 
नही हो रहा था 
कि हम दोष देते उसको
यह तो अब हो चुका था
उसकी आदतों में शुमार
इसीलिए बार बार कहने के बावजूद
वह तैयार नही था 
उसको बदलने के लिए।

Monday, 19 April 2021

चालू मौत का खेल है

चारों ओर मातम है 
चालू मौत का खेल है
रैलियों में व्यस्त सुल्तान हैं
पल पल टूटती जा रहीं 
अपनों की सांस हैं
स्तब्ध प्रजाजन हैं
धड़ल्ले से चल रहा 
नफ़े नुकसान का कारोबार है
कीमत चुका रही
अबोध जनता है
समय के कार्णिको द्वारा
लिखे जा रहें मौत के दस्तावेज हैं
चल रहा झूठी सांत्वनाओं का 
कुत्सित खेल है
और खुश जिम्मेदार लोग हैं
वे गिरा देते हैं अपनी आँखों से
रैलियों के बीच अश्कों के दो बूंद
निज दुःखों को भूलकर गदगद हो 
चल पड़ते लोग हैं
संभालते हुए झण्डों का बोझ
सत्ता के विस्तार के लिए
राजा के साथ।

निःशब्द हूँ

निःशब्द हूँ
अचानक यूँ तुम्हारे चले जाने से
रंग बिरंगे फूलों से
इतराते थे अपनी शाखों पर
पर न जाने क्यों
तुम चले गये 
महकता हुआ आंगन
चहकता बचपन छोड़कर
सदा सदा के लिए

निःशब्द हूँ
यह कल की तो थी बात
जब तुमसे हुई थी 
फोन पर मेरी बात
और तुम हाँफ रहे थे
मेरे मना करने के बावजूद
तुम किये जा रहे थे 
अपने मन की बात
क्या तुम भूल गये?
वे सब बातें जो तुमने की थी मुझसे

निःशब्द हूँ
अचानक यूँ तुम्हारे चले जाने से
बतियाते थे तुम मुझसे  हमेशा
अपने दुःख और पीड़ाओं के बारे में
निश्चिंत होकर
तुम्हारे शब्दों में एक आक्रोश होता था
अपने मान और सम्मान के प्रति
जिसे रौंद दिया जाता था
कुछ जाहिल लोगों के द्वारा हमेशा

निःशब्द हूँ
तुम्हारी यातनाओं के साक्ष्यों को देखकर
जब किया जाता था तुम्हे
पग पग प्रताडित
और तुम काँप जाते थे भीतर तक
फिर भी प्रसन्नचित होकर
दुबारा से लग जाते थे 
कार्य की पूर्ति में
और सम्पन्न कर लौटते थे
विजयी मुस्कान के साथ

निःशब्द हूँ
तुम्हारी इहलीला की समाप्ति सुनकर
लोग पंक्तिबद्ध तो नहीं हो सके 
पर चलते रहेगें लगातार 
तुम्हारी ही खींची रेखाओं पर 
अनुगामियों की भाँति
जिससे हासिल किया जा सकेगा
एक दिन उनका विश्वास
जो हमेशा से करते रहे
तुम्हारी निष्ठा और ईमानदारी पर अविश्वास
एक आशा के साथ कि
तुम लौट आओगे फिर से
अपना मुकाम हासिल करके।

Thursday, 15 April 2021

कोरोना भी

कोरोना भी
बाबू मोसाय हो गया है
जब चाहता है,
जहाँ चाहता है
आ धमकता है
और फैला देता है
डर का कभी न थमने वाला सिलसिला
क्योंकि वह जानता है
दहशत के अस्त्र का प्रभाव
होता है जो अचूक और अकाट्य
इसीलिए खात्मे की सभी 
सम्भावनाओं के बीच
एक बार फिर से लौट आया है
बेखौफ होकर
उसका इस प्रकार से
पुनः लौट आना 
देता है कई सम्भावनाओं जन्म 
जो खोलती हैं 
जिरह की बहुत सी गाँठों को
लगा दी गई थीं जो शेखी के नाम पर
हमारी और तुम्हारी 
जुबानों पर जबरिया
और हम हो गये थे 
उसके खौफ से एकदम मौन
आज फिर से लौट आया
बाबू मोशाय बन कर
कोहराम मचाने पूरे जहान