Saturday, 2 January 2021

हिसाब

दैनिक दिनचर्या के बीच
भागमभाग से दूर
ज़रा तुम सोचो 
ठिठुरते दिनो के बारे में
जो प्रत्येक सुबह आ धमकते है
हमारे समक्ष
नई उमंगों के साथ
दुःख के बाद आये सुख की तरह

सर्द ठिठुरन से ठिठुरती 
वह कमेरा स्त्री
जो हर सुबह आकर बैठती है
अपने दुधमुहे बच्चे के साथ
हाथ में थामे हुए छीनी और हथौड़ी
कुछ बासी बचे हुए
भात एवं रोटियों का नाश्ता कर
तराश रही है 
अनगढ़ पत्थरों में देवत्व को

गुनगुनी धूप से होकर सुर्ख लाल
सुनती है रास्तों की पदचाप
और कुछ आवारा किस्म के 
लोगों की बदजुबानी
एवं तन का निरीक्षण करती
बदनियति में पूरी तरह से 
धंसी हुई निगाहें
बावजूद इसके वह जुटी हुई है
जहान को फिर से सुन्दर
अपने मन की तरह सुन्दर बनाने में

सर्द के कम्पन्न दे रहे थे उसे संत्रास
जिससे बचने के लिए 
नहीं लगा था वहाँ पर कोई अलाव
घंटियों से लगातार बज रहे थे
कम्पित उसके दाँत
जिन्हे शान्त करने में अक्षम था
दुशाले का ताप
मूकदर्शक बना देख रहा था
कस्बे का मुख्य चौराहा

दर्ज हो रहा समय के रजिस्टर में
बीते वर्ष का पूरा लेखा जोखा
जिसमे कहीं पर नहीं था जिक्र
उस मजदूरन का 
जिसने ले रखा था
दुनिया को खूबसूरत बनाने का व्रत
जुटाये हुए अपना पूरा उत्साह
शीघ्र खत्म करने को
बेताब था समय का कार्णिक
जबकि एक कवि जुटा हुआ था
दर्ज करने मे
समय का दर्दनाक हादसा
जिसके अधूरा रह जाता 
बीते हुए समय का हिसाब किताब I


Thursday, 29 October 2020

लिखने दो

लिखने दो
समय को अपना इतिहास
जब आयेगी गवाहों की बारी 
मैं दूँगा गवाही
हक और और हुकूक के लिए
न्याय की बाट जोहते
अन्तिम पायदान पर स्थित 
लोगों की तरफ से
और दर्ज कराऊँगा अपनी
जोरदार उपस्थिति
पड़ने लगेगा जब न्याय पर 
अन्याय का पलड़ा भारी
एवं दी जाने लगेंगी अनैतिक को नैतिक 
घोषित करने की राजाज्ञाएं 
मैं खड़ा होऊंगा उनके प्रतिरोध में
युगों से ओढ़ी हुई 
चुप्पियों को तोड़कर
मैं लिखूंगा समय के सफ्फाक पन्नों पर
अपनी उपस्थिति का इतिहास
जो मिटाये जाने के बावजूद बना रहेगा
समय जैसा अमिट ।

Friday, 11 September 2020

बनवारी मास्टर

परेशान थे बनवारी मास्टर 
कल की तरह
आज भी आयेगा पटवारी
और झाड़ेगा अपनी पटवारीगीरी
जिसे समझना 
न समझने के जैसा ही होगा
फिर भी! 
सुनना तो पड़ेगा ही
मामला राजस्व से जुड़ा जो है
मुकम्मल समय के इंतजार में
आन्तरिक उधेड़बुन में व्यस्त
बनवारी मास्टर से
कैसे किस प्रकार के
तमाम सवाल आ आकर
कर रहे थे लगातार
चुहुलबाजी
परन्तु चुप थे बनवारी मास्टर
एक अंजाने भय से
क्योंकि उन्हे पता था 
पटनारी का रवैया व ढर्रा
सड़िहल दूध पीने के बाद
अक्सर बहक जाता है 
पटवारी
और चल जाती है उसकी कलम
इधर से उधर
इसीलिए परेशान थे 
बनवारी मास्टर
क्योंकि उनके जैसों के द्वारा ही 
बनते है बहुत से पटवारी
जो नाप दे देते हैं
कहीं का कहीं ।

Tuesday, 28 July 2020

जोंक

जोंक जैसे होते हैं 
कुछ लोग
जो गोंद,लेई 
या अन्य चिपकने वाले पदार्थों के 
अभाव में भी
चिपक जाते हैं 
अपने भीतरी दाँतों की चुभती हुई 
आरियों के सहारे
और लगातार चूसते हुए लहू
शीघ्र ही बना देते हैं
अपने अवलम्ब को जर्जर और शक्तिहीन
जमा लेते हैं 
जब पूर्ण रूप से उस पर 
अपना आधिपत्य
और हो जाते हैं सबल
तब करने लगते हैं 
अनावश्यक रूप से प्रत्येक कार्य में 
दखलंदाजी
बावजूद इसके अवलम्ब 
बनाये रखता है
खुद को एत्मिनान से उसके साथ
उसकी यही समझ 
उसे ले जाती है पतन के 
गहरे खड्ग की ओर
और उसके कुनबे को 
बिखराव की तरफ
मांस और हड्डियों के लालची 
आवारा टाइप के श्वान
घसीटते हुए शोणित सिक्त 
शरीरों में खोजते हैं 
मज़बूत हड्डियां 
बीच बीच में अपनी भौंकन के द्वारा
करते हैं दूसरे प्राणियों के समक्ष
अपनी शक्ति का प्रदर्शन
जिसका तमाशा देखती दुनिया 
एवं अफसोस के शब्दों को दुहराते हुए 
बढ़ जाती है  
उसी रफ्तार से आगे
और जारी रहती है जोक की खून चूसने की
कभी न रुकने वाली प्रवृत्ति
जिसके शिकार बनते रहते हैं
गाहे बेगाहे सीधे सादे जीव

Sunday, 26 July 2020

अनुलोम और विलोम

अनुलोम और विलोम के बीच फंसा 
मैकेनिज्म
बहुत ही घातक होता है
क्योंकि यह दोनो चक्की के
दो पाट की तरह होते हैं
जिनके बीच फंसा हुआ
मैकेनिज़म 
पिसता रहता है
आनाज के दाने की भांति
कभी थूल तो कभी महीन
और कष्टों को सहता हुआ भी
करता है कोशिश
दोनों के मध्य सामंजस्य बिठाने
जिससे साथ साथ चलती रहें
दोनों क्रियाएं 
जैसे साथ साथ चलते हैं 
सुख और दुःख
साथ साथ रहते हैं 
धूप और छाया
साथ साथ रहते हैं
स्वेद और श्रम 
उसी प्रकार साथ साथ रहते हैं
अनुलोम और विलोम
कुछ लोग चमकाते है
इन्ही के बीच अपना धंधा
और घोषित करतें हैं 
खुद को फरिश्ता ।
        प्रद्युम्न कुमार सिंह

Saturday, 11 July 2020

पान की वेगम

क्या है ?
पान की बेगम का रंग
लाल तो बिल्कुल नहीं
फिर कौन सा रंग होगा ?
सोचने लायक है यह बात
लालायित रहते हैं
जिसके लिए बहुत से लोग
मिल जायेंगे खोजते हुए 
सीधी सपाट जगहों से लेकर 
गली मुहल्लों के नुक्कड़ों तक
बेपरवाह आवारा से
खोज लेने का 
मन ही मन लगाते हुए कयास
इसलिए नहीं कि वह 
बहुत अधिक प्रिय है उनको
बल्कि इसलिए कि 
उसके रंग में ही छिपा है
उसकी सुर्खी का राज
जो आज भी बना हुआ 
लोगों के लिए अचरज़ का विषय
जिसे खोजने के 
अभी तक के सभी प्रयास
हो चुके हैं असफल
बावजूद इसके कुछ उत्साही लोग
अब भी जारी रखे हुए हैं 
अपने खोजी अभियान
जिससे बना रहे
खोजों के प्रति लोगों का 
दृढ विश्वास
और खोजे जा सकें 
पान की बेगम जैसे 
बहुत से अनखोजे रंग 
फिर भी रह रह उठता है 
मन में एक प्रश्न
आखिर क्या होगा ?
पानी की बेगम का रंग

Tuesday, 7 July 2020

*** तुम्हारा गाँव हूँ***

मैं वही तुम्हारा गाँव हूँ
जिसकी छतें पानी से 
प्रेम करती थीं
चाँद से रात भर बतियाती थीं
सूरज से प्रतिस्पर्धा कर
स्नेहिल छांव में प्रदान करती थी
स्वर्ग सा सुख 
आकर्षण का केन्द्र होती थीं
मेरे पोखरों की फूली हुई कुमुदनियां
संकरी पगडण्डियों में 
फूट पड़ते थे आनन्द के उत्स 
रिश्तों की मिठास को सहेजे
प्यारी गौरैया फुदकती थी 
इस आंगन से उस आंगन तक
मेरी सीमा पर खड़ा 
बूढा बरगद बाँटता था 
पथिकों के बीच अपरमित स्नेह 
और मेरा विस्तृत वक्ष ही 
होता था अमीर,गरीब,
बच्चे,बूढ़े,
स्त्री और पुरुष 
सभी के लिए आश्रय स्थल
मेरे सानिध्य के लिए तरसते थे
देवता भी 
फिर भी तुमने मुझे छोड़ दिया
यह कहते हुए कि
तुम्हारी गोद में रहूँगा तो
वंचित रह जाऊँगा 
आधुनिक सुख-सुविधाओं से 
बावजूद इसके मैंने नहीं बदला 
अपना स्वभाव 
और नही परिवर्तित किया 
जीने का अंदाज
मैं आज भी खड़ा हूँ
अपनी सिवारों के सहारे
ममत्व की उसी भाव भंगिमा के साथ
क्योंकि मैं गाँव हूँ
जो कभी नहीं भागता 
अपने कर्मपथ से
मैं आज भी उतना ही सक्षम हूँ
जितना सदियों पूर्व 
हुआ करता था
जिसमे सहजता सरलता 
और आत्मीयता के गुणों से युक्त 
सरहदों सरीखे
तुम भी होते थे मेरे साथ  I