Friday, 22 May 2020

****बदली से****

बरसात को बुलाने वाली बदली 
रखती है सहेजकर 
अपने आंचल में 
जल  की बूंदे
जैसे सहेजती है 
एक करुणामयी माँ 
अपने पनीले अनुभवों को 
अपने अन्तर्मन मे
और लुटाती है सबके लिए
सहज भाव से
वत्सलता का सुधारस
मगर अफसोस !
अक्सर हम भूल जातें हैं
या यूँ कहें कि
हम विस्मृत कर देते हैं माँ का
अवदान और मातृत्व का भाव
बदली से विलग हुईं बूंदों की तरह 
जो फिर कभी नहीं मिलती 
अपनी जन्मदात्री बदली से।
                      प्रद्युम्न कुमार सिंह

Wednesday, 20 May 2020

****बजारों की उम्मीदें***

आज भी जिन्दा हैं
बंजारों की उम्मीदें 
कि चलती ही रहेगी मुश्किलों में भी 
उनकी जिंदगी की गाड़ी 
फुटपाथों या सड़कों के किनारे 
जहाँ कहीं भी 
दिख जाती है उन्हें 
थोड़ी सी भी 
अनुकूल जगह 
वहीं वे खड़ी कर देते हैं 
अपनी लढी
साथ ही साथ खड़ा कर लेते हैं 
वहीं अपना छोटा सा तम्बू
बाँस-बल्ली के सहारे 
छोंडकर स्त्री और पुरुष का भेद 
बंजारनें उठा लेती हैं 
भारी बोझीले हथौडे                                               बावजूद इसके इन श्रमजीवियों को 
देखा जाता है                                    
हिकारत भरी निगाहो से                          
सुविधा भोगी समाज के द्वारा 
और उड़ाता है इनका मज़ाक၊                    
फिर भी बेलौस जिन्दगी 
जीते है बंजारे                       
और खेल खेल में ही सीख लेते है         
 लोहे के हुनर की बारीकियों को             
नंग धड़ंग उनके बच्चे                             
मगर अफसोस है 
कि ग्लोबल होती जा रही दुनिया में 
खतरे में पड़ता जा रहा है 
बेचारे हुनर बाजों का अस्तित्व

****वाह गुज्जू भाई****

वाह गुज्जू भाई
तुम तो कमाल करते हो
आफत की इस घरी में भी
खुद को लाल कहते हो
लम्पट संग चलकर चम्पई चाले
बन चुके हो रम्पत 
क्या सुर्ख अंदाज है तुम्हारा
क्षण में ही काम तमाम करते हो

वाह गुज्जू भाई
तुम तो कमाल करते हो
घालमेल की खिचड़ी खाकर
धमाल करते हो
रिश्वत,बेइमानी और मक्कारी को
बदल देते हो सहज ही 
गोलमाल की नव परिभाषाओं में
उठती हुई उंगलियों को बुरी तरह मरोड़कर कर देते हो हमेशा के लिए निरर्थक 

वाह गुज्जू भाई
तुम तो कमाल करते हो
विश्व मोहनी सी सूरत पर 
मुस्कान लाकर
तालियों की तीलियों से ही
भुवन को लहूलुहान कर
बड़ी ही साफगोई से
पोत देते हो
सच पर फरेब की कालिमा

वाह गुज्जू भाई
तुम तो कमाल करते हो
धनुवा हो या फिर हो रमुवा
सुनने को तुम्हारे शब्दों की जुगलबन्दी
बेताब रहते हैं
और नवाजते हैं तुम्हे आशीष
तालियों की गड़गड़ाहटों से
जो करती रहती हैं तुम्हारे अन्तस में
उत्साह का संचार
और गूंजती रहती हैं सदा ही
दिल दिमाग के आस पास ।

Saturday, 2 May 2020

***** गंगारामों के उस्ताद जमूरे****

देश घिरा हुआ है
संकट में
कुछ रहे खीस निपोर 
चमगादड़ो सा 
कुछ संकट का रोना रोते
कुछ जनमत बहुमत की
बातें करते
उपाय विहीन सुबकते
जग के नर नारी
दोष एक दूसरे पर मढ़ने में
व्यस्त हुए महाजन
कुछ सड़कों में लूटने को तैयार
कुछ तैनात हुए भक्षक बन
मालों गोदामों में
लूट रहे कुछ भय का राग 
आलाप 
बांह फैलाये कुबेर खड़े है 
महामारी के स्वागत में
शामिल हैं उनके संगी बन
जननायक 
जिसमें निभा रही 
गणिकाएं अहं भूमिकाएं
बढ चढ़कर
मिलकर भटका रहे ध्यान हमारा
मौत के सौदागर 
पस्त हुए हौसलों को 
कन्धा देने को उत्सुक
अब भी खेल रहे जनभावों से
गंगारामों के उस्ताद जमूरे I

***×वह लड़ रहा है***

अन्तर्राष्ट्रीय मजदूर दिवस पर श्रमगारों को समर्पित एक रचना -
वह लड़ लेगा !
प्रकृति के थपेड़ों ने 
पाला है उसे
वह मोहताज नहीं किसी का
न ही गुलाम है किसी का
यह सच है
उसमे हौसलों की कमी नहीं है
उसके ललाट पर चमकती
श्वेद की बूंदे बता २हीं हैं
वह खोद सकता है
प्यास के लिए कुआ
दुह सकता है 
भोजन के लिए घरती को
झुका सकता है आकाश को
अपने फौलादी इरादों से
वह तीर की तरह चीर सकता है
अंधड़ों को
क्योंकि संघर्ष ही उसकी सच्चाई है
आखिर वह एक मजदूर है
जो हर परिस्थिति में जीता है
अपने मौजू अन्दाज में ।

Sunday, 15 March 2020

छुपे हुए हैं

छुपे हुए हैं
अभी भी कई मनसुख लाल 
तुम्हारी ओढी हुई 
खोल में
कर रहें हैं 
जो समय का इंतजार
ध्यान से खोजो उन्हे
मिल जायेंगे लिपटे हुए
चीलरों की तरह 
रिश्तों की दुहाई देते हुए
दिखेंगे तुम्हारे गर्म खून पीने में तत्पर
उन्होने बना लिए है
उन्होने खोज लिए आवरण की 
परतों में ही अपने लिए 
रहने के सुरक्षित स्थल
जिसमे सहायक बनी हुई है
तुम्हारी लाचारी
यद्यपि तुम भी नही हो खुश
इनकी सहभागिता से
बावजूद इसके वे कामयाब है
खुद के मुताबिक तुम्हे ढालने में 
परन्तु तुम्हे सन्तोष है 
परिवर्तित होते समय में
असंगत हो  चुकी
झूठी शान पर के बनाये रखने पर
जिसके हो चुके हो तुम आदी
और वे खुश हैं 
तुम्हारे चकनाचूर स्वप्नो के 
विखराव में भी
छुपने की जगहों में 
अपना स्थायित्त्व हाशिल करके
क्योंकि उन्हे मालूम हो चुकी है
तुम्हारी कमजोर पड़ती हुई
सामर्थ्य जिसे धराशायी होने में
कुछ दिन ही शेष रह गये हैं

Monday, 9 March 2020

*****खौफ के साये में दिल्ली****

आखिर क्यों ?
चुप रहती है दिल्ली
उदार दाराशिकोह को 
अपमानित कर
घुमाया जाता है जब
हाथी की नंगी पीठ पर बैठाकर.

आखिर क्यों ?
चुप रहती है दिल्ली
रक्त पिपासु
नादिर शाह मुस्कुराता है
जब रक्तरंजित लाशों के बीच 
खड़े होकर

आखिर क्यों ?
चुप रहती है दिल्ली
हिन्दुस्तान का लाल 
बन्दा बैरागी
जब कुर्बान हो जाता है 
देश के खातिर

आखिर क्यों ?
चुप रहती है दिल्ली
विद्रोह का नेतृत्व करने वाले
बहादुर शाह ज़फर को
जब कर लिया जाता है
देशद्रोह के जुर्म में 
उसी के पितामहों प्रपितामहों की 
कब्रो के पास से

आखिर कब तक ? 
चलता रहेगा यूँ ही
और खामोश बनी रहेगी दिल्ली
क्या कभी भी ?
हुंकार नहीं भरेगी दिल्ली 
या फिर सदा की भाँति
एक बार फिर से किसी आतताई के 
खौफ के साये में 
डरी सहमी दिल्ली
नतमस्तक बनी रहेगी मौन