Thursday, 16 January 2020

***बड़ा आदमी***

जो छोटो से
प्रेम और स्नेह का 
आचरण करता है
औरों की खामियों में भी
खूबियाँ खोजने का 
प्रयास करता है
आगे बढते व्यक्ति की
हर सम्भव मदद करता है
दूसरों के सुख दुख में 
सहभागिता करता है
भले ही उसके पास कुछ न हो
मैं मानता हूँ 
उसे बड़ा आदमी

जो दूसरों के लिए गड्ढे
खोदता है 
आगे बढने के सभी द्वार 
बन्द करता है
छिद्रान्वेषण के नये नये 
मार्ग खोजता है
बात बात पर झूठ का 
सहारा लेता है
अपना दोष दूसरों के
सर मढता है
उसके पास सब कुछ 
होने बाद भी
मै नहीं मानता हूँ
उसे बड़ा आदमी I



****हंसकर बिकने के लिए****

जो कुछ भी दिखाई देता है
क्या सब कुछ होता है
बिकाऊ ?
वाजार जिसे बेचना चाहता है
या फिर जिसे बेचता है
आखिर कब तक लगे रहोगे
बेंच खरीद के धंधे में

तुम कितना जानते हो
बेंच और खरीद के बारे में
क्या तुम्हारे द्वारा खरीदा जा सकता है
सभी का ईमान
या सबकी इच्छाएं
तुमने क्या कभी देखा है ?
किसी को बिकते
या फिर किसी को खरीदते

हक की आवाज उठाने को
क्या बिकना कहते हैं
या फिर सबको समान नज़रिये से
देखने को
या फिर पराई इच्छा पर
खुद को समर्पित कर देने को ही
कहेंगे बिकना
यदि इसे बिकना कहते हैं
तो मैं तैयार हूं वस्तु की तरह
हंस कर बिकने के लिए T


Wednesday, 15 January 2020

***दूसरी बहन***

दूसरी
मां होती है
बड़ी बहन
सहती है सभी कष्ट
पर खड़ी रहती है
छोटे भाई बहनों के आगे
सारी परेशानी से
रक्षार्थ मजबूत दीवार सी
माता सी वत्सलता की
प्रतिमूर्ति
स्नेह की सूत्रधार
होती है
सच में!
दूसरी मां होती है
बड़ी बहन




****तुम्हारा प्रेम****


तुम्हारा प्रेम !
वक्त की शिराओं में
स्वरों का विविधता युक्त 
अंदाज लिए हुए 
घुला हुआ है
शब्दहीन सिकुड़न में
ठिठुरन के साथ
आंखों में चमकता
तुम्हारा शहर 
और उसमे भटकते तुम
इस वेरहम वक़्त में 
भेद और अभेदयुक्त
गुमनाम चुप्पियां देती हैं
बताती हैं 
तुम्हारे प्रेम की दास्तान
जिसे शब्दों में व्यक्त कर सकना
सम्भव नहीं है
जैसे कांटों के लिवास में
उलझ कर रह जाता है
सुख का टिमटिमाता संसार

Tuesday, 14 January 2020

****खत्म होती****

खत्म होती जा रहीं हैं
धीरे धीरे
मानव के प्रति मानवीयता की
समस्त सीमाएं
समय के साथ साथ
बदल रही हैं
बहुत ही तेजी के साथ
रिश्तों के बीच की तपिश
जिनकी जिम्मेदारी
उठाते हैं
मानव अहं जन्य भाव 
जिन्हे भड़काने का कार्य करते हैं
कुछ निहित स्वार्थ
एवं उनके संचालक लोग
रोपदेते हैं जो बड़ी ही 
खूबसूरती के साथ नफ़रती अमरबेल
जिनकी जड़ों के चंगुल में
आ जाते है
बहुत निरपराध पौधे 
एवं उनकी शाखाएं
ठीक उसी प्रकार होते हैं
जैसे कुछ शातिर लोग
और उनके कुनबे
आमादा होते हैं खत्म करने में 
हंसते खेलते परिवारों को

***वे खोदते हैं***

वे बार बार खोदते हैं
अपनी चतुराई के गड्ढे
और उसमें खड़ी करते हैं
पेंचो खम की
बहुत सी अनुलंधनीय दीवारे
जिनकी रक्षार्थ नियुक्त करते हैं
बाकायदा प्रशिक्षित भृत्य
देते है जिन्हे
पगार के रूप में
स्वार्थ प्रेरित लिजलिजी 
बातो की हुंडियां
जिसकी चकमक में 
खो देते हैं अपनी चमक
सारे आदर्श और कर्तव्य बोध
बावजूद इसके वे
लगातार जुटे रहते हैं
निरन्तर खोदने में
हिकारती गड्ढे
इस प्रकार वे बेखौफ हो 
लागू करते हैं
अपना घृणित एजेण्डा
जिसकी जद में आता है
सभ्य समाज का बहुत बड़ा हिस्सा

Monday, 6 January 2020

****सच्चे योद्धा सरीखी****

हाँ !
उसे नहीं आती
अक्षरों की जुगाली
फिर भी वह
उत्सुक रहती है
उनके प्रति
कभी दायें कभी बायें
उन्हें ही खोजती है
उसकी निगाहे
जब कभी मिलती है
फुरसत
निकल पड़ती है वह
अंजान पथिक सी
खेल के समय जब खेल रहे होते हैं
सारे बच्चे
वह खोई रहती है
अक्षरों के इंतजार में ।

हाँ!
उसे नहीं आती
अक्षरों की जुगाली
पकवानों की आस में
जब सारे बच्चे
छोड देते हैं
सम्पूर्ण़ कार्य अधूरे ही
और गड़ाये रहते हैं
लालच भरी निगाहे उन्ही पर
तब भी वह व्यस्त रखती है
अपनी निगाहें
खोजने में अक्षरों की राह |

हां !
उसे नहीं आती
अक्षरो की जुगाली
फिर भी वह डटी रहती है
एक सच्चे योद्धा सरीखी
सुबरनों की खोज में
जिन्हे खोजा जाना अभी भी
शेष हैं ।