Wednesday, 15 January 2020

***दूसरी बहन***

दूसरी
मां होती है
बड़ी बहन
सहती है सभी कष्ट
पर खड़ी रहती है
छोटे भाई बहनों के आगे
सारी परेशानी से
रक्षार्थ मजबूत दीवार सी
माता सी वत्सलता की
प्रतिमूर्ति
स्नेह की सूत्रधार
होती है
सच में!
दूसरी मां होती है
बड़ी बहन




****तुम्हारा प्रेम****


तुम्हारा प्रेम !
वक्त की शिराओं में
स्वरों का विविधता युक्त 
अंदाज लिए हुए 
घुला हुआ है
शब्दहीन सिकुड़न में
ठिठुरन के साथ
आंखों में चमकता
तुम्हारा शहर 
और उसमे भटकते तुम
इस वेरहम वक़्त में 
भेद और अभेदयुक्त
गुमनाम चुप्पियां देती हैं
बताती हैं 
तुम्हारे प्रेम की दास्तान
जिसे शब्दों में व्यक्त कर सकना
सम्भव नहीं है
जैसे कांटों के लिवास में
उलझ कर रह जाता है
सुख का टिमटिमाता संसार

Tuesday, 14 January 2020

****खत्म होती****

खत्म होती जा रहीं हैं
धीरे धीरे
मानव के प्रति मानवीयता की
समस्त सीमाएं
समय के साथ साथ
बदल रही हैं
बहुत ही तेजी के साथ
रिश्तों के बीच की तपिश
जिनकी जिम्मेदारी
उठाते हैं
मानव अहं जन्य भाव 
जिन्हे भड़काने का कार्य करते हैं
कुछ निहित स्वार्थ
एवं उनके संचालक लोग
रोपदेते हैं जो बड़ी ही 
खूबसूरती के साथ नफ़रती अमरबेल
जिनकी जड़ों के चंगुल में
आ जाते है
बहुत निरपराध पौधे 
एवं उनकी शाखाएं
ठीक उसी प्रकार होते हैं
जैसे कुछ शातिर लोग
और उनके कुनबे
आमादा होते हैं खत्म करने में 
हंसते खेलते परिवारों को

***वे खोदते हैं***

वे बार बार खोदते हैं
अपनी चतुराई के गड्ढे
और उसमें खड़ी करते हैं
पेंचो खम की
बहुत सी अनुलंधनीय दीवारे
जिनकी रक्षार्थ नियुक्त करते हैं
बाकायदा प्रशिक्षित भृत्य
देते है जिन्हे
पगार के रूप में
स्वार्थ प्रेरित लिजलिजी 
बातो की हुंडियां
जिसकी चकमक में 
खो देते हैं अपनी चमक
सारे आदर्श और कर्तव्य बोध
बावजूद इसके वे
लगातार जुटे रहते हैं
निरन्तर खोदने में
हिकारती गड्ढे
इस प्रकार वे बेखौफ हो 
लागू करते हैं
अपना घृणित एजेण्डा
जिसकी जद में आता है
सभ्य समाज का बहुत बड़ा हिस्सा

Monday, 6 January 2020

****सच्चे योद्धा सरीखी****

हाँ !
उसे नहीं आती
अक्षरों की जुगाली
फिर भी वह
उत्सुक रहती है
उनके प्रति
कभी दायें कभी बायें
उन्हें ही खोजती है
उसकी निगाहे
जब कभी मिलती है
फुरसत
निकल पड़ती है वह
अंजान पथिक सी
खेल के समय जब खेल रहे होते हैं
सारे बच्चे
वह खोई रहती है
अक्षरों के इंतजार में ।

हाँ!
उसे नहीं आती
अक्षरों की जुगाली
पकवानों की आस में
जब सारे बच्चे
छोड देते हैं
सम्पूर्ण़ कार्य अधूरे ही
और गड़ाये रहते हैं
लालच भरी निगाहे उन्ही पर
तब भी वह व्यस्त रखती है
अपनी निगाहें
खोजने में अक्षरों की राह |

हां !
उसे नहीं आती
अक्षरो की जुगाली
फिर भी वह डटी रहती है
एक सच्चे योद्धा सरीखी
सुबरनों की खोज में
जिन्हे खोजा जाना अभी भी
शेष हैं ।

Monday, 23 December 2019

****लड़की झांकती है****

लड़की झांकती है
जब अपने एकान्त मे
उसे दिखाई पड़ती हैं
बहुत सी जानी पहिचानी
धूमिल सी रूहें
जिनमें वह खोजती है
अपनी ही खोई हुई रुह
और खो जाती है
अपने ही खोये वजूद में
वह बार बार करती है
प्रयत्न
अपने वजूद से निकलने का
फिर भी वह रहती है निकलने में
असफल
क्योंकि लड़की और उसका वजूद
मिलकर हो जाते है एक
जिनमें से एक को अलग करना
एक को खत्म कर देना है

सुनो गाँधी !

सुनों गाँधी ! नहीं भाता
बार बार इस प्रकार
प्रश्नों की जद में
हुम्हारा आना
पर दूर घटित होते घटनाक्रम
बार बार कुरेदते हैं
स्मृतियों को
कि कुछ लोग
आज भी तुले हुए हैं
तुम्हारे सत्य और अहिंसा को
मात देने में
इसके लिए तुम बनाये जा रहे हो
लगातार मोहरा
कोई चिपका हुआ है
तुम्हारे जीवन की झलकियों के साथ
और कोई अपने इरादों का
भुरभुरा चूर्ण धुरककर
उसमे अपनी विषाक्त नियति का
मिठास घोलकर 
जुटा हुआ है साधने पर
अपना स्वार्थ
रक्ताभ अंचल में
कुनमनाती अहिंसा
आज भी देखती है
तुम्हारी अनुलंघनीय राह
सुनो गाँधी !
पहले से भी अधिक
प्रासांगिक हो गई है
तुम्हारे विचारों की परख की
और उनकी परख रखने वाले पारखी
जिनके डग भरने मात्र से
डगमगाने लगती थीं सत्ता
और उनकी राहें
सुनो गाँधी !
क्या  फिर से आओगे ?
सत्य अहिंसा का पाठ पढाने
अपने देश में