Wednesday, 15 January 2020
****तुम्हारा प्रेम****
Tuesday, 14 January 2020
****खत्म होती****
***वे खोदते हैं***
Monday, 6 January 2020
****सच्चे योद्धा सरीखी****
हाँ !
उसे नहीं आती
अक्षरों की जुगाली
फिर भी वह
उत्सुक रहती है
उनके प्रति
कभी दायें कभी बायें
उन्हें ही खोजती है
उसकी निगाहे
जब कभी मिलती है
फुरसत
निकल पड़ती है वह
अंजान पथिक सी
खेल के समय जब खेल रहे होते हैं
सारे बच्चे
वह खोई रहती है
अक्षरों के इंतजार में ।
हाँ!
उसे नहीं आती
अक्षरों की जुगाली
पकवानों की आस में
जब सारे बच्चे
छोड देते हैं
सम्पूर्ण़ कार्य अधूरे ही
और गड़ाये रहते हैं
लालच भरी निगाहे उन्ही पर
तब भी वह व्यस्त रखती है
अपनी निगाहें
खोजने में अक्षरों की राह |
हां !
उसे नहीं आती
अक्षरो की जुगाली
फिर भी वह डटी रहती है
एक सच्चे योद्धा सरीखी
सुबरनों की खोज में
जिन्हे खोजा जाना अभी भी
शेष हैं ।
Monday, 23 December 2019
****लड़की झांकती है****
लड़की झांकती है
जब अपने एकान्त मे
उसे दिखाई पड़ती हैं
बहुत सी जानी पहिचानी
धूमिल सी रूहें
जिनमें वह खोजती है
अपनी ही खोई हुई रुह
और खो जाती है
अपने ही खोये वजूद में
वह बार बार करती है
प्रयत्न
अपने वजूद से निकलने का
फिर भी वह रहती है निकलने में
असफल
क्योंकि लड़की और उसका वजूद
मिलकर हो जाते है एक
जिनमें से एक को अलग करना
एक को खत्म कर देना है
सुनो गाँधी !
सुनों गाँधी ! नहीं भाता
बार बार इस प्रकार
प्रश्नों की जद में
हुम्हारा आना
पर दूर घटित होते घटनाक्रम
बार बार कुरेदते हैं
स्मृतियों को
कि कुछ लोग
आज भी तुले हुए हैं
तुम्हारे सत्य और अहिंसा को
मात देने में
इसके लिए तुम बनाये जा रहे हो
लगातार मोहरा
कोई चिपका हुआ है
तुम्हारे जीवन की झलकियों के साथ
और कोई अपने इरादों का
भुरभुरा चूर्ण धुरककर
उसमे अपनी विषाक्त नियति का
मिठास घोलकर
जुटा हुआ है साधने पर
अपना स्वार्थ
रक्ताभ अंचल में
कुनमनाती अहिंसा
आज भी देखती है
तुम्हारी अनुलंघनीय राह
सुनो गाँधी !
पहले से भी अधिक
प्रासांगिक हो गई है
तुम्हारे विचारों की परख की
और उनकी परख रखने वाले पारखी
जिनके डग भरने मात्र से
डगमगाने लगती थीं सत्ता
और उनकी राहें
सुनो गाँधी !
क्या फिर से आओगे ?
सत्य अहिंसा का पाठ पढाने
अपने देश में
Sunday, 10 November 2019
****चेहरों में आई सिकन के रूप में****
साफ तौर पर
देखा जा सकता था
चेहरों पर
खिसकती जमीनों का
खौफ
धमाचौकड़ी के माध्यम से
किया जा रहा था
उसका भयावहता के मुआयना
शायद यह पहली बार था
जब भय के साये में
सांस लेने को मजबूर था
खौफ का मंजर ।
ललाट की तनी हुई नशों की
उभरी हुई रेखाएं
दे रही थीं स्पष्ट दिखाई
बात साफ थी
आइने की तरह
उजड़ चुकी थी
पुस्तैनी ख्वाबों की दुनिया
बसने से पूर्व ही
और वे विवश थे
बेचारे होकर
संदेशा साफ था
चूक चुकी थी
सियासतदान की सियासत
और गश खाकर
गिर चुके थे पैरोंकार
खिसकती जमीन का
मिजाज भांपकर
खामोश थी धरती,
चुप था अकाश
एवं स्तब्ध था जनसमूह
पर लगातार चिल्लाये जा रहे थे
भोंपू की ऊल जलूल
क्योंकि स्पष्ट था
जीत हार से
दूर खड़ा जनसैलाब
कर रहा था
जय पराजय से अलग
जज़्बातों से उबरने का उपाय
जो कर रहा था
उन्हे मोड़ने
सकारात्मक प्रयास
क्योंकि वह समझ चुका था
चन्दे से इकट्ठी
धनराशि को
चट करने में माहिर
दीमकों की हकीकत
जो प्रकट हो रही थी
चेहरों में आई
सिकन के रूप में
के रूप में