Monday, 17 June 2019

*****बच्चे मर रहें हैं****

बच्चे मर रहें है
चमकी के कहर से नहीं
बल्कि चमकी के भय से
जिम्मेदार खामोश हैं
चमकी की चमक से
रैलियों मे साथ रहने वाले
निकल चुके हैं
राज्य की परिधि से
बहुत दूर है
नीति नियन्ता व्यस्त हैं
डाक्टरों की सुरक्षा में
महामहिम इंतजार में हैं
किसी अमीर बच्चे के
मरने के
चुंधिया गई हैं
मीडिया की आंखे
वे नहीं देख पा रहीं
बच्चों के बिगड़े हालात
उन्हे बच्चों से अधिक
लापरवाह डॉक्टर का पिटना
बड़ी घटना लग रही है
लोग सहमें हैं
चमकी के कहर से नहीं
बल्कि अपने खेवनहारों की
बेरुखी से
जो अकारण ही
पहुँचा दिये जाते  हैं
उनको और उन जैसे
तमाम लोगों को
चमकी जैसे बुखार के
मुहानों पर
जहाँ से बच निकलना
वैसे ही नहीं होता आसान
जैसे हासियों को त्यागकर
नई लीक बनाना ।

Sunday, 16 June 2019

****वे जो पापकार्म खाते हैं****

वे जो पापकार्न खाते है
किसी मासूम के
क्यों कहा जाय?
किसी अमीर के साथ होने वाली
दुर्घटना पर
निकालते है कैडिल मार्च
सांझ ढलते ही
ठंडा पड़ जाता है
जिनका आक्रोश
और कर लेते हैं समझौता
उन्ही के रहनवारों से
जिनके द्वारा दिये जाते हैं
ऐसे घटनाक्रमों को
अंजाम
वे जो पापकार्न खाते हैं
शाम होते ही गटक जाते हैं
मदिरा की घूंटों के साथ
सुबह के किये गये
अन्याय और भूल जाते है
कैण्डिल मार्य के वजूद को
क्योंकि होते हैं ऐसे लोग
अनाम भीड़ का
सिर्फ एक भाग
समय के साथ जो बिखरकर
खो जाती है
अपने अस्तित्वहीन वजूद में
जिसका आदि और अंत
टिका होता है
आंच के आधार पर
जो एक दिन उन्हे भी
खत्म कर देती है
भुट्टे से बने पापकार्न की तरह

Friday, 14 June 2019

****उन्होने कभी शिमला नहीं देखा****

उन्होने कभी शिमला
नहीं देखा
फिर भी जानते हैं
शिमला को
दिन प्रति दिन
बदतर होते जा रहे
कराहते जलाशयों को
बेदर्द जमाने के पैरोकारों को
जिन्होने बना रखे है
कृत्रिम अभाव के हालात
मज़बूर हो जाये जिससेे लोग
और सुगभ हो सकें
उनके व्यापारों का
सुभारम्भ
उन्होने कभी शिमला
नही देखा
फिर भी जानते हैं
शिमला को
क्योंकि उनके रोम रोम में
समाया है
एक खूबसूरत शिमला
जिसकी खूबसूरती को
चट कर रहें हैं
पूंजी के आवारा पशु
बढते जा रहें हैं
दिनोदिन जिनके झुण्ड
जिन्हे रोक पाना
लगभग असम्भव है ।
उन्होंने कभी शिमला
नहीं देखा
लगभग हर शहर तब्दील हो चुका है
एक त्रासदयुक्त शिमला में
जिसमे जूझना पड़ता है हर रोज
पानी जैसी
रोजमर्रा की समस्याओं से
उनके खिलाफ
नारे लगाती आवाम को
जो गुर्राते भेडि़यों के डर से
प्रत्येक शाम लौट जाती है
खाली हांथ अपने घरों को

Tuesday, 11 June 2019

****एक कोने से दूसरे कोने तक****

टूट रहा स्वप्न
जन जन का
टूट रही
उफनती आशाएं
जन मन की
खत्म हो रहे
आशाओं के रास्ते
सजीले
और छूट रही
पगडंडियाँ सारी
उम्मीदों की
तोड़ रहे दम
भूख से बिलखते सारे
छा गयी हैं धुंध
सारे आसमान में
छा गई गम की काली बदली
समस्त जहान में
कैसे सुनेगा वह
तेरे मन के गीत सुहाने
आ रहे हैं जब अंधड़
चारों ओर से
जिनमें  नहीं है आस
किसी जलधार की
ऐसे में वह चातक सा तो नहीं
सुन सकता जो गर्जना तेरी
नही चल रहा
कोरे आश्वासनों से 
अब काम उसका
अब उसे भी चाहिए
अपने हक़ का कोई पैमाना
पिरोये हो जिसमे सूत्र अनेक
गढ़ सके जिनसे
वह भी नए प्रतिमान
नयी आशाएं व इच्छायें
अब वह नही देना चाहता
घुटने अपना दम
फिजूल के वसूलों के साये में
वह भी अब चाहता है जीना
अपने हिस्से की जिन्दगी
अपने हिस्से की खुशियाँ
इसीलिए वह तोड़ देना चाहता है
सारे व्यर्थ के सारे बंधनों को
आशाओं प्रत्याशाओं को
अब वह भी नदियों की
कल कल के साथ खेलना चाहता है
पहाड़ों के साथ करना चाहता है
अपने मन की बात
पेडों के पतझड़ के बाद
नया वसंत देखना चाहता है
और आकाश के परिंदों सा
उड़ना चाहता है खुले आसमान में
निर्बाध रूप से
एक कोने से दूसरे कोने तक |

Wednesday, 29 May 2019

****वो जो बदल रहा था****

वो जो बदल रहा था
गिरते और चढते पारे सा
अपना मिजाज़
और हंसे जा रहा था लगातार बनावटी हंसी
कौन था

वो जो कर रहा था
निगहबानी
उनकी ही शर्तो पर
एक अनाम मौन के साथ
कौन था

वो जो करता था
उजासियों को भी बदनाम
अपनी ही नादानियों पर
थामें हुए था ढेसर सहारा
कौन था

वो जो बजा रहा था
अपने ही अंदाज में
अपने शातिर दिमाग की ताली
कर रहा था खुराफात की जुगाली
कौन था

वो जो बदल रहा था
समझ को नासमझी में
अपने ही जाल में खुद को उलझा रहा था
बिन बात की बात बना रहा था
आखिर कौन था

वो जो दरख्तों सा
एक के बाद एक बिखरता जा रहा था
छिन्न भिन्न भाल मस्तक हो रहा था
फिर दुहाई उसी की दे रहा था
कौन था

Thursday, 9 May 2019

****इन दिनों*****


इन दिनों
नहीं दीखते पहाड़ों के
आसपास
जंगली जीवों के समूह
ना ही दिखाई जाती हैं
समाचार चैनलों में
उनकी क्रान्तिकारी आवाजें

इन दिनों
सत्ता के दलालों द्वारा
फोड़े जा रहें हैं
पहाड़ों के माथे
और बिगाड़ा जा रहा है
उनका स्वरूप
और साधे जा रहें हैं
कुत्सित स्वार्थ
जिन्हे पुनः साध पाना जीवन के साधने से भी हो गया है दुष्कर

इन दिनों
कलम के सिपाहियों द्वारा बेच दी गई हैं कलमें 
चित्रकारों ने प्रतिभा की धनी
कूंचियां
और रंगकर्मियों ने बेच दी है
रद्दी के भाव अभिनय की अपनी सहज वृत्तियां
जिनसे नही की जा सकतीं सत्य के अन्वेषण की सम्भावनाएं

इन दिनों
तिलिस्मी दास्तानों के
सिखाई जा रहीं हैं
हकीकत को प्रभावित करने
युक्तियां
और ठगे जा रहें जीवन मूल्य
जिन्हे चाहकर रोक पाना लगभग हो गया है असंभव

इन दिनों
बढ़ रही आतिशी तपिश
कोहरे और धुंध की हो रही है
पौ बारह
आशाओं की उम्मीदें भी
अब नही रोक सकतीं
ध्वस्त होते पहाड़ो का जीवन

इन दिनों
पहाड़ो से दरक रहें हैं
रिश्तों के परिदृश्य
आशाओं प्रत्यासाओं का गारा  भी
नहीं रख सकता जिन्हे महफूज
इन दिनों
विलुप्त हो रही तितलियां और छोटे कीट
बेदम हो रहा है
सम्पूर्ण वातावरण इन्फ्रारेजों के प्रभाव से
बावजूद इसके मौन घारण किये हुए हैं सारे पक्ष
और गढा जा रहा है
विकास कें नाम पर
जोरों से बिनाश का वितान

Friday, 3 May 2019

****उम्मीद की धुंधली किरण*****

उम्मीद की धुंधली
किरण के साथ
वे कल की तरह आज भी
खड़े हैं हांसिये पर
अब भी सहेजे हुए हैं
चिरंतन की तरह निरन्तर को
तमाम वंदिशों के बाद भी
वे संजोये हुए हैं
कुछ कर गुजरने का माद्दा
यद्यपि उन्हे मालूम हैं
हौंसलों से ज्यादा जरूरी है
भूख के लिए रोटी
इसीलिए बार बार की
चेतावनियों के बाद भी
अनायास ही गूंज उठती है
सनसनाती हुंकार
जिससे हिल उठती हैं
आज भी
सजे हुए कंगूरों की चूले
जो उन्हें बाध्य करती है
हांसिये की ओर देखने के लिए
शायद यही भय
उन्हें करता है
विवश
हासिये पर खड़े लोगों के
पक्ष में
बोलने के लिए
और ना चाहते हुए भी
उन्हे बोलना पड़ता है
उपेक्षित लोगों के पक्ष में