Thursday, 21 March 2019

****कौन रही होगी****

कौन रही होगी
वह स्त्री
जिसे जलाया गया होगा
उन्माद के नाम पर
पहली बार
सोचो ज़रा क्या कभी ?
आज से भी अधिक
शक्तिशाली रही होगी
एक स्त्री
जिसके प्रतिरोध को
आग की लपटों के बीच
झोक दिया गया होगा
भड़भूजे के भाड़ में पड़े
दाने की तरह
आखिर क्यूं मौन
होती रहीं हैं
हमारी सम्वेदनाएं
अत्याचार के विरुद्ध
क्यूं सजा दी जाती
रही है
पथभ्रष्ट के तमंगे
टांककर करीने से
और जला दी जाती रहीं
समाज में औरतें
शायद ही इसका कोई माकूल
जवाब हो आपके पास
क्योंकि सदैव से
तुम्हारे पास
एक ही जवाब रहा है
दुश्चरित होती हैं
औरतें
और उन्हे वश में
रखने के लिए
आवश्यक होता है
जलाने जैसे अस्त्रों का
प्रयोग करना

Thursday, 7 March 2019

***** खत्म होती शामों के साथ*****/

खत्म होती
शामों के साथ
वे तैयार थे
गहन निद्रा के लिए
खरीदे जा चुके थे
शाही सपने
और दावतों के
शाही पात्र
शफ़ कागज के चन्द
टुकड़े
थामे हाँथ
प्रदर्शित कर रहे थे
अपना पौरुष
जिनसे निचोड़ा जा सके
मजीठिया अंदाज में
धमनियों से रक्त का
एक एक कतरा
और साधे जा सके
बावरे से व्यग्र होते
लालच युक्त स्वार्थ
और साधी जा सकें
अतृप्त लिप्साएं
जो समय की आपाधापी में
पृष्ठ पर पुन:
उभर आई हैं

Tuesday, 5 March 2019

****प्रतीकों के सहारे*****


वे प्रतीको के सहारे
चाहते हैं 
पार उतरना 
उनका विश्वास है
प्रतीकों के तिलस्मी 
वजूद पर
उन्हे मालूम है 
हथियार के रूप मे 
प्रतीकों के 
प्रयोग करने की कला
इसीलिए समय समय पर वे
करते हैं अपने हित में
कुशलतापूर्वक
प्रतीकों का प्रयोग
आप कुछ समझ पायें
उससे पूर्व ही
वे गढ लेते हैं
नये प्रतीक चिन्ह 
और बेधड़क करते है 
उनका प्रयोग
तुम्हारे जानने और समझने के
ठीक पहले तक
इस प्रकार बचाये रखते हैं
प्रतीक और प्रतीको के साये में
खुद का वजूद ।

 प्रद्युम्न कुमार सिंह
बबेरू बांदा उ०प्र०
पिन -210121
मोबाइल-08858172741

Monday, 4 March 2019

****क्या तुम तैयार हो****

क्या तुम तैयार हो ?
ओढी दसाई
मानसिकता ओढने के लिए
यदि हां
तो निश्चित रूप से
तुम दे रहे हो खुद को
धोखा
क्या तुम तैयार हो ?
आदिम परम्पराओं की ओर
जाने के लिए
यदि हां
तो निश्चित रूप से तुम
ढोंग कर रहे हो
अपने आप से
क्या तुम उत्सुक हो ?
कर्म के वगैर इच्छाओं की
पूर्ति के लिए
यदि हां
तो निश्चय ही तुम
भटक गये हो
अपने मार्ग से
क्योंकि इस प्रकार का
तुम्हारा नवीनता के प्रति
उदासीन व्यवहार
तुम्हे बना देगा एक दिन
अप्रसांगिक

**** किंवदन्तियों में***"

किंवदन्तियों में
आज भी महफूज है
कृष्ण का आंसुओं से
बालसखा दरिद्र
सुदामा के
चरणों का धोया जाना
यह मिथ जरूर है
पर हकीकत के बहुत
करीब था
राजा का प्रजा के
दुःखों से एकाकार
होने की
किन्तु कुछ आत्ममुग्धता के
शिकार  मानुष
करते हैं
महत्वाकांक्षाओं की
पूर्ति हेतु
पग प्रक्षालन
और उनके चारण लोग
बताते है
उसे कर्तव्य की जगह
उनका अनूठा कार्य
जिससे सहानुभूति पाकर
भुनाया जा सके
मिथ की भांति
भगवान बनने के
स्वांग को
आखिर पैर घुलने
ताली बजवाने से
समस्यायें
खत्म नहीं हो जाती
न ही खत्म होती हैं
समस्यायें
कुढ़न होती है
ऐसे चालबाजों से जो
तुम्हारे नाम को
भुनाने का करते है
प्रयत्न
तुम्हारी दलीलों से
तुम्हारे अन्दर छिपे
दुर्दान्त भेडिये की
गन्ध आती है
जिसकी नियति ही
धोखा देने की
होती है

Wednesday, 27 February 2019

**** जब हम अधिक होने लगते हैं***

होने लगते हैं
जब हम अधिक सभ्य 
और आधुनिक
भूलने लगते हैं
अपनी मातृभाषा 
और उसके सरोकार
और हम करने लगते है
स्थापित उसके स्थान पर
प्रतिस्थापनी भाषा
ठीक वैसे ही 
अच्छे जलस्रोत की आस में
नदी के उद्गम को छोड़ 
चले जाते है 
हम उससे बहुत दूर
क्योंकि यह भी सच है
अनुदित नहीं होती 
मातृभाषाएँ 
वरन अन्तस की आवाज 
बन प्रसरित होती है 
सहज ही लोक तक
जिसे बोलने और समझने में 
महसूस किया जाता है गर्व
यद्यपि समस्याओं को जानने
समझने के लिये आवश्यक होता है
उसका बुनियादी ढांचा 
उसके लिए विद्वता से अधिक
आवश्यक होता है 
व्यकितयों का मौलिक होना 
जिसमे टिका होता है
किसी भी भाषा का 
मज़बूत एवं टिकाऊ वितान

Monday, 18 February 2019

***** ईश्वर की भूख हड़ताल*****

भूख हड़ताल पर है
मेरा और तेरा ईश्वर
इसीलिए नहीं सुनता
तेरी और मेरी
तू करता रह मन्दिरों में
अर्चन पूजन
और मैं करता रहूं
मस्जिदों के नक्काशीदार
गुम्बदों के बीच
न तो तेरे मंदिर में
अर्चन पूजन से
टूटेगी उसकी हड़ताल
न मेरे मास्जिद में पढ़ते
कलमें से
यदि सच में तुड़वानी ही है
उसकी हड़ताल तो
तुम्हे करने होंगे
उसके द्वारा बनाये गये
नियमो का पालन
तुम्हे छोड़ने होगे भेदभाव के
पापाचार
और अपनाना होगा
समरसता का उसका सिद्धान्त
तभी हो सकोगे तोड़ने में
कामयाब
ईश्वर की भूख हड़ताल