वे जो सोये
हुए हैं
उनसे कहो
स्वप्न देखे
वे जो जागे
हुए है
उनसे कहो शीध्र
निकल पड़े.
और वे जो खाली
पेट सो जाने को
मजबूर हैं
उनसे कहो
उम्मीद न छोड़े
वे जो दिन रात
खेतो में हल
चलाने को उत्सुक
रहते है
उनसे कहो
उन्ही के हौसलों से
दुनिया आबाद है
और वे जो मैले कुचैले फटे
हाथ छिपा रहें हैं
उनसे कहो
हाथों को छुपायें नहीं
क्योकि दुनिया में
इनसे खूबसूरत
कुछ भी नही है
और जो स्वांग भरते है
अपनी श्रेष्ठता व बहादुरी का
उनसे कहो
उनकी श्रेष्ठता
जुगुनुओं के
प्रकाश में ही
प्रचारित प्रसारित होती है
सूर्य के प्रकाश में
उनका कहीं
अता पता नही होता
Sunday, 17 February 2019
XXX वे जो सोये हुए हैंxxx
Saturday, 9 February 2019
*****शायद वे तोड़ना चाहते हैं*****
शायद वे तोड़ना चाहते हैं
तुम्हारी हड्डियां
शायद उन्हे जाननी हो
तुम्हारी हड्डियों की
मज़बूती
या फिर उन्हे सता रहा हो
तुम्हारी ताकतवर
हहुियो का भय
या फिर मिटा देना
चाहते हो
भय और हड्डियों के
बीच के फासले
और बिखेर देना चाहते हों
फिजाओं तक समरसता की
खुशबू
जिनसे लाभान्वित हो सकें
आने वाली सभ्यताएं
और उनको मानने वाले
सभ्य लोग
और हतोत्साहित हो सके
दुष्टता की पोषक
सभ्यताएं
प्रद्युम्न कुमार सिंह
*****उन्हे मालूम है*****
उन्हे मालूम है
शिक्षित और शिक्षा की बारीकियां
इसीलिए वे निरंतर करते है
उनमे कटौती
जिन्हें समझना
सहज नही होता
जैसे सहजरूप से
नहीं समझी जा सकती
कुंजड़े की डांडी
मारने की कला
बनिये के नफ़े की गणित
जालसाज़ का जाली वक्तव्य
मित्रता के पीछे छिपाया गया
शत्रुता का खंजर
वाग्जाल के पीछे
छिपी नशंसता
सौम्यता के पीछे खड़ी
अराजकता
वैसे ही आसानी से
नहीं समझी जा सकती
शिक्षा में खर्च कटौती की
असली वजह
Friday, 8 February 2019
***** प्रेम*****
प्रेम !
एक एहसास है
पूर्ण होने का
मात्र पा लेना ही
प्रेम नहीं है
उत्सर्ग भी प्रेम ही है
यद्यपि धरती और आकाश
कभी नहीं मिलते
एक दूसरे से
लेकिन आज भी
उनके प्रेम को
आदर्श मानते हैं लोग
हिमालय कभी भी
नहीं पहुंचता समुद्र तक
फिर भी उसका प्रेम
नदियों के रूप में
अनवरुत पहुंचता है
उस तक
सूरज बहुत दूर होता है
धरती से
फिर भी तपिश के रूप में
धरती के सुख दुःख में
साथ रहता है
खुलेतौर पर प्रकृति
कभी भी नहीं करती
अपने प्रेम का इज़हार
फिर भी पातों पर मोती
डालकर
बनाती है अपने प्रेम को
चिरन्तन
क्योंकि प्रेम होता ही ऐसा
सम्भव नही होता
जिसे किसी परिधि में
बांध पाना
Saturday, 2 February 2019
****मासूकाओं सी मासूम होती है****
मासूकाओं सी
मासूम होती है
उत्कंठाएँ
बना लेती है
आसानी से
मस्तिष्क प्रमस्तिष्क के
कोने में जगह
और आडोलित करतीं हैं
अन्तः से वाह्य तक
प्रश्न उठाते प्रश्नों को
बेदखल कर देना चाहती हैं
सीमाओं सीमा से
और प्रदान करती हैं
उठने की क्षमताएं
इसके थकन से पूर्व
क्योंकि मासूकाओं सी
मासूम होती हैं
उत्कंठाएं
जिन्हे रोकना खुद को
रोकने जैसा होता है
Wednesday, 23 January 2019
भूख और प्यास के पक्ष में
बहुत से हाथ उठे थे
बहुत से उठने बांकी थे
मांग थी
एक अदद रोटी की
भूख की त्रासद
मिटाने के निमित्त
इसीलिए आज चुप रहने की अपेक्षा
की गई थी चुप्पी के विरुद्ध
मुनादी
शायद आवाज की
गड़गड़ाहट से
सूख जायेंगे बहुत से हलक
परिणामस्वरूप ढूंढे जाने लगेंगे
हथकण्डों के रूप में
बहुत से उपाय
चुप्पियों के निमित्त
बावजूद इसक पहली बार
तोड़ी जायेगी
सदियों से ओढ़ी हुई चुप्पी
भूख और प्यास के पक्ष में
Sunday, 20 January 2019
"हंसते रंगों की भीड़ "
हंसत थे लाखों रंग
दुकानें सजी थीं
सजे थे करीने से
आलमारियों के खांचे
तलाश रहे थे लोग
रुबरू होने के बहाने
मुस्कुराहटों ने उलटे थे
अनगिनत स्वप्नों के
परत दर परत
अनदेखे पन्ने
कुछ खोये थे
किताबों के आवरणों के रंगों में
कुछ जीवन के पन्नों में
खंगाला जा रहा था
अतीत से
वर्तमान तक का सफ़र
और तलाशा जा रहा था
रुचियों का कैटेलाग
लाज़मी था कुछ
उथल पुथल का होना
सिसकियों के बीच दानवी
हंसी का आना
कुछ निभा रहे थे
औपचारिकताएं
मित्रों से किये गये वादों की
कुछ खोज रहे थे
सेल्फ़ियों के बहाने
रंगीन तितलियों के पर
यद्यपि ऐसे लोगों नहीं करते
किसी की भी परवाह
न ही रखते है किसी से
कोई रफ़्त जब्त
कुछ वास्तव में देख रहे थे
पुस्तकों का मोहक संसार
और उनके आचार व्यवहार
प्रकाशक भी गिरहकट की तरह
तैयार थे
काटने को भारी भरकम जेब
चल रहा था आरोप प्रत्यारोप का
कभी न खत्म होने वाला दौर
कुछ ठहाके अनायास गूंजे थे
मानो खिल उठा हो
बिजली का फूल
जहां तहां चल रहा था
बधाईयाँ का दौर
उड़ रही थीं
कुछ रसीदी टिकट सी
कागजों की चिंदियाँ
मानों दे रहीं हो गवाही
बाजार के उठने की
हाँ हाँ यह शंखनाद था
विश्व पुस्तक मेले के अवसान का
कुछ यादें पेवस्त हो रहीं थीं
दिमाग के सुरक्षित कोनों में
और तैयार कर रहीं थी
खुद को
आगामी तिथिक्रम की प्रतीक्षा के निमित्त
आज दिल्ली थोड़ी मायूस थी
किन्तु शीघ्र ही भुला देगी
सब कुछ
और खो जायेगी
एक अनाम शोर की
भीड़ में
जैसे हम सभी खो जाते हैं
हंसते रंगों की भीड़ में
प्रद्युम्न कुमार सिंह