Tuesday, 23 October 2018

***** अतीत के ज्वालामुखी*****

खत्म होने का नाम ही
नहीं लेती
तुम्हारी यादें
जब भी चाहता हूँ
लिखना
कोरे कागद पर
स्मृतियों के कुछ लफ्ज
ठहर जाती हैं कलम
और ठिठक जाता है
हौसला
ताजा हो जाती हैं
विस्मृत हो चुकी
इबारते
भरने लगता है
ऊहापोह युक्त मन में
उमंगों का लावा
और बेताव हो उठता है
फटने को
वर्तमान में खोया हुआ
अतीत का ज्वालामुखी

Friday, 12 October 2018

***** मुखर होने लगी है******

मुखर होते लगी है
सदियों से ओढी चुप्पियां
रात के घने अंधेरे में
ओढा दी गईं थी
सुबकती सिसकियों को
अभिमान था अपने पौरुष का
जिससे ढांक सकते हैं
रसूख की चादर से
खुद के कृत्य को
जिसे किसी भी तरह
नहीं कहा जा सकता
नैतिक
उन्हे खुद से भी अधिक
भरोसा था
अपनी बलवती सभ्यता पर
जिसने आदिम काल से
बख्श रखा है
अजेय शक्ति जिसके समक्ष
हमेशा से नतमस्तक होने को
विवश हैं स्त्रियां
रोने और बिसूरने की स्थिति
में प्रयोग किया जाता रहा है
कुलटा घोषित करने का भय
जिसकी आड़ में
हमेशा से फूलता और फलता रहा
स्त्री विमर्श का विटप
गली मुहल्ले राह चलते
प्रलोभनों की खेप के सहारे
घायल की जाती रहीं देवियां
समय बदल रहा
अपनी करवट
अब जवाब देना होगा
अहिल्याओ, सरस्वतियोंं,
सीताओं के स्थान पर
इन्द्रों,चन्द्रमाओं,गौतमों,ब्रहमाओं
और रामों को
अब वे बच नहीं सकते
नशे और द्यूत के नामों से
क्योंकि मुखर होने लगी हैं
सदियों से ओढी चुप्पियां
जो तुम्हारी चुनौतियों का
जवाब देने पर आमादा हैं
उन्हे और अधिक समय तक
रोक पाना
अब तनिक भी
नहीं रह गया है
तुम्हारे बस में
         प्रद्युम्न कुमार सिंह

***** वर्जनाओं के विरुद्ध******

वर्जनाओं के
विरुद्ध
तनी हुई मुट्ठियों में
अभी भी बची हुई है
इतनी सामर्थ्य
कि भर सके
तुम्हारे विरुद्ध
हुंकार
और दर्ज करा सके
अपना प्रतिरोध
यद्यपि तुम्हारी अकड़न को
यह स्वीकार नहीं होगा
बावजूद इसके
भिची हुई चबुरियां और
तनी हुई मुट्ठियां
कर देगी तुम्हारे विरुद्ध
इकबाल बुलन्दी का
जयघोष
तुम्हारी क्रूरताएं चाहकर भी
रोक पाने में होंगी
असफल
हक के लिए बढते हुए कदम
अब फैसला तुम्हारे
हाथ में है
कि बचे हुए समय में
जमीनदोज होती
आस्मिताएं बचाने का
करते हो सफल प्रयास
या फिर घुट - घुटकर
दम तोड़ने के लिए
छोड़ देना चाहते हो उन्हे ।
             प्रद्युम्न कुमार सिंह

***** हम तब्दील हो चुके है*****

हम तब्दील हो चुके हँ
खूंखार यांत्रिक
गिरोह मे
रक्षक से भक्षक
बन चुके हैं
अब हमारे शिकार
दुर्दान्त नहीं रहे
वरन् लक्ष्य बन चुके हैं
निरीह लोग
चाहकर भी मुमकिन नही
बदलना
क्योंकि अब हम इंसान
नहीं रहे
हमने अब  स्वीकृत कर लिया है
कायराना कमांड
और समय समय पर करते हैं
बाखूबी इसका प्रयोग
क्योंकि हम तब्दील हो चुके हैं
रिमोट संचालित यांत्रिक
मशीनी गिरोह में
जिसे जरूरत होती है मात्र
एक अदद विद्युत तरंगीय
संकेत की
          प्रद्युम्न कुमार सिंह

Wednesday, 10 October 2018

**** सूरज की सुनहरी किरणों से पूर्व ****

सूरज की सुनहरी किरणों से
पूर्व ही
शुरू हो जाता हैं
पखेरूओं का कोलाहल
रंभाने लगती हैं
दुधारू गायें और उनके बछड़े
खेतो में जाने को
उत्सुक होने लगता है
कृषकवीर
और खुश हो जाती हैं
बूढी मांयें
डरावनी लम्बी रात्रि के
खत्म होने पर
चहकने लगते हैं
आंगन के चक्कर काटते
मासूम बच्चे
खुशी से फूलकर कुप्पा हो
उठती है
कोने में दुबकी बैठी
बिल्ली
सुनाई देने लगता है
एक ऐसा स्वर
जो हमेशा ही रात्रि के
मौन के पश्चात
सूबह होने पर
सुनाई देता है
व्यक्त में अव्यक्त को
समेटे हुए ।

Friday, 5 October 2018

***** वर्जनाओं के विरुद्ध******

तुम्हारी वर्जनाओं के
विरुद्ध
तनी हुई मुट्ठियों में
अभी भी इतनी सामर्थ्य
बची है
कि तुम्हारे विरुद्ध भर सके
हुंकार
और दर्ज करा सके
अपना प्रतिरोध
यद्यपि तुम्हारी हेकड़ी को
यह स्वीकार नहीं
बावजूद इसके
भिची हुई चबुरियां और
तने हुए हाथ
तुम्हारे विरुद्ध कर देंगी
इकबाल बुलन्दी का
जयघोष
तुम्हारी क्रूरताएं भी
रोक नहीं सकती
हक के लिए बढते हुए
उनके कदम
अब फैसला तुम्हारे
हाथ में है
कि बचे हुए समय में
जमीनदोज होती
आस्मिताएं बचाने का
प्रयत्न करते हो
या फिर घुटकर
दम तोड़ने के लिए
छोड़ देना चाहते हो ।

Wednesday, 3 October 2018

****बचा नहीं पाओगे *****

अब तुम्हे छोड़नी होगी
अपनी स्वामिभक्ति
तुम्हे फिर से फूकना होगा
अन्याय और षड़यन्त्र के विरूद्ध
संघर्ष का विगुल
तुम्हे फिर से परिभाषित करने होंगे
स्वामिभक्ति के हानि लाभ
तुम्हे हटानी होगी
चमकीले पोष्टरों से
खुद की नज़र
और देखनी होगी
मज़हवी आग में झुलसती
बेतरतीब दुनिया का अक्स
तुम्हे सीखना होगा
हकीकत और फरेब के बीच
अन्तर करना
तुम्हे समझनी होगी
नफ़रत और प्रेम के बीच की खाई
तुम्हे मिटाना होगा
नफ़रती आग
जिसमे झुलसकर तबाह
हो चुके हैं
तुम्हारे और हमारे घर
यदि तुम अब भी खामोश रहे
तो समझ लो
तुम्हारी ही संततियां नकार देगी तुम्हे
और तुम चाहकर भी
बचा नहीं पाओगे खुद को