Sunday, 26 August 2018

*****हाँ मैं बांदा हूँ*****

हाँ मैं बांदा हूं
चांद के साथ
और चांदमारी के साथ
मेरा नाता
कभी नही होती मेरी शाम
केन से मेरा रिश्ता प्यारा
कालिन्दी के थूल तट
लहर बर्तुल सा मैं सिमटा
रत्नाकर से बाल्मीकि
और रामबोला से
तुलसी बनाने की कला
मुझमे
केदार और बोधा
मेरे दो लाल
अक्खड़ता मेरा स्वभाव
पानीदारी है मेरी जग जाहिर
मुझमे सदा से रमते आये है
जोगी और भोगी
फिर भी मैं
बदला नहीं कभी
और बदलना मेरी फितरत को
मंजूर नहीं
आदि से लेकर आज तक
बह चुका है केन में
बहुत पानी
आज भी नही हुआ बूढा मैं
अक्षुण्य मेरी जवानी
मुझसे ही होकर
निकलती है
प्रदेश की राहें
और देश की मंजिलें
मुझे नज़र अंदाज करना
अपने आप को
नज़र अंदाज करने जैसा है
बांदा के वीराने से
आज भी उठती हैं
आवाजें
कराहती तरंगों संग केन
खनकती आवाजे नवाबों की
नवाब टैंक जिनका साक्षी
वीर शिवाजी की यादें
मानस में करती ताजा
बियावन वीराने मे
खोई है वस्तु अनेक
बावजूद इसके आज भी
बचा है आज भी
बहुत कुछ शेष
बदलने के जारी हैं
बदस्तूर प्रयास
देखती हैं नवाबों, रईसों
की भौंहे आज भी
तिर्यक दृष्टि
कहीं मिटाये जा रहे हैं
कहीं पुरावशेष
तो कहीं बसी जेहन की
यादें
फिर भी आज भी लहकते हैं
किशोरी साहू और नट के
आर्त नाद
नारायन,काली और उमा का
प्रतिरोध
बना हुआ है
एक पहेली आज
फटेहाल उन्नत विशाल
लेकर भाल ललकारता
गढ़ कलिंजर
व भूरागढ़ का दुर्ग विशाल
आते हैं जहाँ गुणलुब्ध
सुधीर सुजान
देखरेख करने विरासत की
रवीन्द्र महान
साथ देते जिनका ओमभारती
सदृश्य विद्वान
वृजेश नीरज, अजीत प्रियदर्शी
आलोचक योद्धा
साधते कलम का संधान
केशव जलज से
कलमकार करते सदा
कविता अरण्य में भ्रमण
केन का वह अविचल पथ
जिसे पर चलते थे कभी
पहरिया और कवि केदार
बीड़ी के कस भरता
छन्नू सारंगीसाज
लगता है जैसे वह है
कल की बात
बाल्मीकि,बोधा,तुलसी
महसूसते जहाँ
सर्वजन की दु:ख दर्द
तमसा मुरला नही
मात्र नदियां यहां की
जीवन की सजल  धारा़यें थी
सुधी जनों के अन्तरतम में
अविरल जो बहती थी
भूलता नही है वह
कैरा लोहार
टेढे से भी अक्खड़
लोहे को
कर देता था
तत्क्षण सीधा और सहज
जैसे हो पालतू वह चौवा
उसका
मानता हो उसकी जो
हर बात
यादों में बसते है
चित्रकूट के चारों धाम
घूमघाम करते थे
मनुज दनुज और देव
मिलती थी
पावन पर्ण कुटी में
शान्ति सौहार्द्र और मानवता की शिक्षा
घाम तात में तपते लोग
कभी नही छोड़ते
अपना धैर्य
शेरशाह से लेकर पेशवा बाजीराव
डगमगाया था जिनका धैर्य यही पर
फिर भी बांदा रहा
अलमस्त सदा
फर्क पड़ने के बावजूद
विचलित नही हुआ
गिरकर उठने की ताकत उसमे
जीवन में रस भरने को
सदा जागता है यह बांदा
बार बार कहता पीके
सहज सरल इसका जन

Sunday, 19 August 2018

*****मांझी*****

हाँ वह मांझी ही
हो सकता है
जो बढते ज्वार के बीच भी
रखता है हौसला
और तय करता है
अकेले ही
अप्रत्याशित यात्रा
चलना तो दूर
वरन् देखना भी
होता है
रोंगटे खड़े कर देने वाला
फिर भी वह तय करता है
बढते दरिया के
फासले
उनके लिए जो
निहार रहे होते है
टकटकी लगाए हुए
मंजिलों की ओर
यह अनायास ही नही कर पाता वह
वरन् बचपन से लेकर
आज तक
उसने दरियाव को देखा है
और उससे गलबहियां रही हैं
उसकी
शायद इसीलिए वह नहीं
हिचकता
वरन् निभाता है अपना फर्ज
और साधता है
डगमगाते विश्वासों के बीच
सामंजस्य
वह लड़ता है सैलाब से
एक सच्चे अन्वेषी की तरह
खोजता है सुरक्षित मार्ग
वह दिखाता है
आने वाली पीढियो को
एक नई रोशनी
जो अक्सर थम जाती है
थकन और डर के कारण ।
हां वह मांझी ही हो सकता है
जिसे अपने प्राणों से अधिक
औरों के जान की हिफ़ाजत
प्रिय होती है

Wednesday, 27 June 2018

**** बेलगाम घोड़े****

सत्ता के बेलगाम
घोड़े
रौदने लगे
जब सब कुछ
साथी खड़े हो जाओ
तानकर
भिंची हुई मुट्ठियां
क्योंकि तुम्हारी तनी हुई
मुट्ठियां ही
पर्याप्त होती ह
थामने के लिए
अश्वों की टापों को
इसलिए साथी जितना जल्दी
सम्भव हो सके
तुम तान लो
मुट्ठियां
जिससे साधे जा सके
लोकतन्त्र के ढहते पावे
और रोकी जा सके
गिरती अस्मिताएं

Sunday, 22 April 2018

****शिक्षा के व्यापार****

लोक लुभाते मतवाले
जीवन के कुछ तार देखे ၊
रंगों के भीतर,
उभरते रंग हजार देखे
जगजीत जीवन की
किलकते कुलहार देखे ၊
पर्णकुटी अटपट,
तारनहार देखे
शिक्षक शिक्षण के बढते
व्यापार देखे
चिर उनींदी आँखों मे तिरते
स्वप्न हजार देखे ၊
मेेवा में सेेवा के बढते,
फलसार देखे
सूझ बूझ के अबूझ पर
उतरते शीश बार बार देखे ၊
कुलभूषण को
धूप दीप नैवेद्य से,
चढ़ते प्रसाद देखे
गुरु शिष्य के मध्य
वेतन के व्यवहार देखे
समय समय के अक्सर
खेत खलिहान देखे
ठेके के बढते सम्बन्धों बीच
शिक्षण बीमार देखे ၊
देश के कर्णधारों को
डूबते बीच मझधार देखे ।
शिक्षा के गिरते स्तर में
शिक्षक के व्यवहार देखे ।

Wednesday, 21 March 2018

*****नही भरे जा सकते****

समकालीन कविता के स्तम्भ केदारनाथ सिह अलविदा -
नहीं भरे जा सकते
शून्य आयाम
नहीं ठहर सकते
गुजरे कल
नहीं लौट सकतीं
गर्म सांसे
नहीं आ सकते वापस
जाने वाले लोग
नहीं पलट सकते
नीरव में विलीन स्वर
बस यूँ ही
एक एक करके
दुनिया छोड़ चले
जाना है
रज से रूज तक
एक असीम शान्त स्वर
चिर परिचित
हंसी हंसता हैं
अपने ही अपने
संवेदन में
जो अभी भी रिक्त है
जिसे पूरित कर पाना
लगभग असम्भव है
.

***""रात कभी भी नही छोड़ती अंधेरे का साथ***

रात कभी भी नहीं छोड़ती
अंधेरे का साथ
कारण स्पष्ट है
रात्रि को रात्रि बनाता है
अंधेरा
क्योंकि उसकी
श्रीवृद्धि
उसी में निहित है
रात्रि का ही एक पड़ाव
होता है
प्रातःकाल
जिसमें रात्रि छोड़ने लगती है
अंधेरों का साथ
भ्रमरों के गुंजार के बहाने
खोजने लगती है
अलग आशियाना
और उषा की
किरण के साथ
खुद को परिवर्तित
कर देती है
दिन के सापेक्ष
जिससे बची रहें
उम्मीदें
और बचा रहे
अंधेरे का अस्तित्व ।
    प्रद्युम्न कुमार सिंह

Saturday, 27 January 2018

****महानता का महन्त*****

सभ्य है
इसीलिए बर्बर हैं
असत्य को सत्य से
अधिक करते हैं
स्वीकार
इसीलिए
दिन बा दिन
उठता जा रहा है
भरोसा
सत्य और अहिंसा से
क्योंकि हमारी सहनशक्ति ने
बदल लिया है
अपना पाला
और जा टिकी है
असहनशीलता की शरण में
इसीलिए नफा नुकसान
उसे तुच्छ लगते हैं
उसे लगता है
उसके अतिरिक्त सभी
मूर्ख और डरपोक हैं
जिन्हे प्रतिवाद व प्रतिरोध से
लेना देना नहीं है
इसीलिए वे इतिहास को
बदलकर
बनाना चाहते हैं
भूगोल
जिसमें निरंकुशता
और आत्मश्लाधा 
पार कर दे
आतंक की सारी हदें
और घोषित किया जा सके
उन्हे महानता का महन्त
जिससे प्रशस्त हो सके
उनके पूजे जाने का मार्ग