यशोधरा !
तुमको पढाया गया
पति परमेश्वर की सेवा का पाठ
जैसे पढ़ाया जाता है
एक बच्चे को
कलम और कागज के
रिश्ते की कहानी
खेलने कूदने से अधिक
कपड़ों की हिफ़ाजत के
तौर तरीके
जिससे रखा जा सके उन्हे
अधिक समय तक
स्वच्छ और साफ
तुम्हे हमेशा से
देखा जाता रहा है
कोफ्त निगाहों से
जैसे देखे जाते हैं
दुर्दिन में आकाशीय बादल
जिनकी वीभत्स गड़गड़ाहट के बीच
पनपती हैं
बहुत से आशंकाएं
उनके चाल चरित्र को लेकर
हमेशा से तुम्हे समझा गया
मात्र भोग की वस्तु
जो केवल जानती है
आज्ञा पालन की बात
लौटा दी जाती रही
तुम्हारी वेदनाएं
जमाने की फौलादी
दीवारों से
मानव कल्याण के नाम पर
तुम रही हमेशा शान्त
और प्रतिरोध रहित
क्योंकि तुम्हे अभी भी
उम्मीद थी
स्त्री जीवन का मतलब
छीनना नहीं होता
अपितु होता है
समाज को कुछ देना
तुम करती रही अपने साथ
हमेशा छल
इसीलिए कभी भी नही
जुटा सकी
प्रतिबद्धताओं से मुकरने का
का साहस
और ना ही समझा पाई
अपनी असहमतियों के
पीड़ायुक्त भाव
तुम आज भी
देखी जाती हो तन्मयता के साथ
उसी वेश में
दूर जलती हुई आग के
साथ
तुम आज भी नहीं बता पाई
अपनी अनहद
बल्कि सिमटी रही शालीन
भाषा सी
नियमों उपनियमों के
बन्धन में
खुद को बचाये रखने की
जद्दोजहद में
अब भी तुम बचाये हुए हो
एक अदृश्य आधार
जिसके.इर्दगिर्द
आज भी घूमते हैं
तुम्हारे करुण स्वर
जिन्हें हमेशा की तरह
एक बार फिर से
कर जायेगा
अनसुना
यशोधरा !
कैसी स्त्री हो तुम
रोक नहीं पाई जो
पति प्रयाण
कहां चूक गये तुम्हारे वे
तीक्ष्ण हथियार
जिनके प्रभाव से
घोर तपस्या में रत
यति मुनि भी छोड़ देते थे
तप का विचार
यशोधरा !
निश्चित रूप से तुम्हे करना होगा
पुनः मन्थन अपने
स्त्रीत्व का
कैसे और कहाँ पड़ गई
तुम कमजोर ?
जबकि तुमसे ताकतवर
निकली
बेजान वीणा
जो खींच ले गई शौतन की तरह
तुमसे तुम्हारा सिद्धार्थ
कहो कहो यशोधरा
कहीं ऐसा तो नहीं !
ऊब चुका हो तुमसे
तुम्हारा पुरुष
तुम्हे शीघ्र करनी होगी
इसकी पड़ताल
तुम्हे जानने होंगे
सिद्धार्थ के मुख मोड़ने के
वास्तविक कारण
जिसके कारण एक झटके में
उसने तोड़ दिया
युगों युगों का तुम्हारा
विश्वास
यशोधरा !
कहीं ऐसा तो नहीं
तुम्हारे स्त्रीत्व से हार गया हो
सिद्धार्थ
और छिपाने को अपनी
हिकारत
मोड़ लिया हो खुद से ही
खुद का मुख
जिससे बची रहे
उसकी झूठी शान
और बचा रहे उसका
डिगा ईंमान
यशोधरा कुछ तो बोलो
दुनिया की आंखों में पड़े
राज से पर्दा उठाओ
क्योंकि तुम्हारी चुप्पी ही
प्रबल बनाती है सैकड़ो बुद्ध
और प्रताड़ित करती है
स्त्रीत्व को
जिसकी आड़ में आज भी
ढूढ़ लेते है संयास का
सुरक्षित बहाना
और थोप देते हैं
यशोधरा के सर पर
अनन्त काल तक चलने वाली
चुप्पी
यशोधरा !
शायद तुम्हारी चुप्पी में ही
छुपे हैं
सिद्धार्थ के बुद्ध बनने के
बीज
नहीं तो कब का धराशायी हो गया होता
बुद्ध और उसका कुनबा ।
प्रद्युम्न कुमार सिह
Saturday, 16 September 2017
****यशोधरा*****
Thursday, 14 September 2017
****प्रात पवन*****
प्रात पवन के साथ
खुल रही थी
आँखों के पास आँख
ऊंघते बागों में
खिल थी प्रात की धूप
खत्म हुई
चाँद की चाँद मारी
सिमट गये हैं भूतों के डेरे
लूट गई वह कैसे
जीवन की स्वर्णिम
बेला
कलम की रफ़तार में
हनक के बीच
घुट रहा था जीवन का संगीत
सुलझन और उलझन
की गठरी बांधे
घूम रहा वह गली गली
तरस रहा था वह विश्वास के
एक अदद को
आँखों के पास
खुल रही थी आँख
*****भेद रहा था****
भेद रहा था
खग कुल का
कलरव
भूतल का नीरव तल
खोज रहा धान्य के
अवशेष
क्षुधा मिटाने को सप्रयास
तृषित नैनों की
मद्धिम ज्योति मे
घुलती थी आदिम भूख
कोटरों के कोनों से
किलकित नव उत्साह
बुन रहा था स्वप्न नये
तम आलोकित जगती का
भाल
भरता था उनमे
जीवन का भार
झर रही थी स्वप्निल धूप
खिल रहीं थी जिसमे
बचपन की सुरभि
सोये थे जिसमें अनन्त विचार
इसी से व्यग्र था
उसका मन
खैर ख्वाब की बातों में डूबा
पहुँच गया कब वह
क्षितिज के पार
सूरज ढलने से पहले
चिन्ता थी शेष एकमात्र
गा रहा था अब भी
उसका हुलसित मन
धंसा हुआ
जीवन संघर्षों के बीच
****सौदागरों के शब्द****"
सौदागरों के शब्द
बुनते हैं
भाषाओं के मखमली जाल
जिसे
महसूसा जा सकता है
क्षण के आखिरी पड़ाव तक
और उस उलझाव में
किया जा सकता है
बिना किसी लाव लश्गर के
बात करने का
तकल्लुस
बजाये जा सकते है
बेसुरे राग
उड़ाये जा सकतें हैं फूलों से
वफादार मक्खियों के झुण्ड
जिन्होने चूसकर
पुष्प रस
तोड़ दी
सारी सीमाएं
अपने मक्खी होने की
सौदागरों के शब्द
बुनते हैं भाषाओं के मखमली
जाल
Tuesday, 12 September 2017
**** वे नहीं चूकते****
वे नही चूकते !
करने से अपना बखान
वे पकड़ते हैं बार बार
बाह्य कर्ण की भित्ति
और सिकोड़ते हैं
दूर तलक विस्तृत ललाट को
जैसे किसी ने कर दी हो
घर में शिकायत
इसीलिए ऊभन चूभन
के साथ
वे दिखते हैं चिन्तित
जिससे जान सकें लोग
उनकी कार्यशीलता
और उनकी लगन
जिसका परिणाम अभी तक
रहा है सिफर
हाव भावों की चुहुलबाजी द्वारा
वे दर्शाना चाहते हैं
फर्जी मज़बूरी
जिह्वा और वाणी के माध्यम से
वे सिद्ध कर देना चाहते हैं
अपने को बेकसूर
वे जता देना चाहते हैं
अभी भी नहीं भूलें हैं
अपनी कही हुई बातें
जिसकी प्रतिपूर्ति हेतु
वे अब भी हैं प्रयासरत
वे भांपते है
लबो की खामोशी
बनाया जा सके जिसको
खुद के बचाव का
कारगर हथियार
किन्तु वे भूल जाते है
खामोश आवाजे जब भी
मुखर होती हैं
बदल देती हैं जहान का
नक्शा
खो जाती है जिसमें
सियासत की बहुत सी
मगरूर सत्ताएं
और और आबाद हो जाती है
नवीन सभ्यताएं
और नवीन संभावनाएं ।
Wednesday, 6 September 2017
*****यार तुम कितने खुदगर्ज हो*****
यार! तुम कितने
खुदगर्ज हो
आप ही आप
दिखने को हुए अधीर
दुधली उजारी में
अंधियारे कितने लिए
फिर रहे हो तुम
आदमी की कीमत
हांक से अपनी आंक रहे
यार ! तुम कितने
खुदगर्ज निकले
हाथों में तुरीण व शमशीर लिए
आसन की धौंस में चिपके
नैतिक को अनैतिक बताने पर
तुले रहे
बांधन में सावन
और सावन में सौत लिए
खार से खर की महारथ
तुम समझ बैठे
सम्भव है लोभ क्रोध के बस
यह सब तुम करते हो
इस्पात तोड़ने की लिए
भरौनी
मुर्चे से अभी तक
तुम अकड़ रहे
शायद समझ तुम्हारी
अभी नही हुई दुरुस्त
जीवन की कड़ियों की
समझ अभी तुम्हे नहीं हुई
गुस्से का हल फितूर नहीं
सहन करने को
हर कोई मज़बूर नही
घमण्ड तुम्हारा आकाश अटा
शायद तुम पहले से
कमजोर हुए
अक्कड़ बक्कड़ का
यह कोई खेल नहीं
खेल सके जो हर कोई
समय रहते सम्भल जाओ भाई
जीवन मे इसका
कोई मोेल नहीं
जब जब अनाधिकार
अपहृत हुई है सीता
पता तो होगा ही तुम्हे
क्या क्या रावण पर है बीता
Tuesday, 5 September 2017
***** दम घोटू वर्जनाएं*****
फैली थीं
अथाह सागर सी
अन्तस के वीराने में
उठती रही थी
उत्तुंग तरंगों सी
भाव प्रवण संवेदनाएं
जब तब
घात प्रतिघात से
करती थी घायल
और तोड़ देना चाहती थीं
वेदनाओं के शैलाब युक्त
तटबंध
वे हो जाना चाहती थी
उच्र्छ्खंल
ज्वार भाटों सी
जिससे निर्मित किया जा सके
एक उन्मादी आक्रोश
और तोड़ी जा सकें
वक्त वेवक्त की
दम घोटू वर्जनाएं