वे आज भी
डरते है
तमाम सुरक्षा इंतजामों के
बावजूद
Z औरy जवानों की
पुख्ता निगहबानी में
तमाम नीतियां से
सुरक्षित
बनाये जाने पर भी
तमगों के ऊपर तमगें
टांके जाने और
ईमानदारी और हितैषी
होने का
दावा पेश करने के
बावजूद भी
वे डरते हैं
गरीब निहत्थे लोगों के
खाली पेटों और उठे हुए
हाथों से
जो कांपती रूह के
साथ
बुलन्द करते हैं
खौफ के विरुद्ध
अपनी आवाज
Saturday, 5 August 2017
*****वे आज भी डरते है*****
Tuesday, 1 August 2017
*****आशा की नव पौध*****
प्रपंचों में जो उगता है
छलछन्दों में जो ढलता है
नाक भौं में जो फर्क
समझता है
रौब औरों पर गठता है
शोषित दुर्बल संग
झगड़ता है
पाप पुण्य के
खेल खेलता है
डैनों के बिन उड़ता है
ऐसे मानी कलहंसो को
धूल चटाने आया हूं
बिन बूदों की बारिस में
उस प्रबल पुंज की
वेदी से
ध्वजा उखाड़ने
आया हूं !
जीवन के सन्देशों में
जीवन का राग बजाने
आया हूं
आपा की पगधोई में
जीवन बेल है जो बोई
वह बेल खिलाने
आया
सतयुग द्वापर त्रेता कलियुग
से भिन्न इक
युग नया बनाने
आया हूं
जीवन के घनघोर
वियावन में
आशा की नव पौध जमाने
आया हूं
*****आशिक की मज़ार*****
लोग जाने क्यों ?
छोड़ जाया करते है
अपनों को बेगानों सा !
आशिक की मजार के पास
और चले जाया करते हैं
बेफिक्र हो
वक्त के थपेड़ों को सहने को
मजबूर लाचार होकर
सूरज ढलने से पहले ही
रिश्तों की रस्सी ले
बांधने को
बरेदियों की तरह
आ जाया करते हैं
न जाने कौन सी
खता थी उनकी ?
जो छोड़ जाया करते हैं
उसी जगह
जहां थी आशिक की मजार
जाने कब तक यूं ही ?
अभिशप्त जीवन
जीने को
मजबूर होती रहेंगी हूरे
आखिर कब तक ?
सीने में दर्द छुपा
सहने को
मजबूर होती रहेंगी
कब मिल पायेगा इंशाफ
हूरों को और कब
स्वावलमबन के साथ
स्वयं को संभालेगी
लोग जाने क्यों ?
छोड़ जाया करते है
अपनों को बेगानों सा
आशिक की मजार के पास |
Saturday, 29 July 2017
*****भोथरे उपाय*****
कवि !
तुम इतना डरे हुए
क्यों हो ?
कही तुमने जुर्म के
खिलाफ
कविता तो नहीं
लिख दी
कही भदेश भाषा के
अनगढ़ शब्दों को तो नहीं
पिरो दिये
जिसके कारण सारे गिद्ध
तुम्हे नोच खाने को
उतावले हैं
पर कवि तुम डरना
नहीं
इन बेइमान गिद्धो से
आज तक इन्होंने ही
रोक रखी थी
मानव बनने की
राह
और जब तुम जैसा
निर्भीक कवि
इन्हे चुनौती दे रहा है
ये डराने के सारे
भोथरे
उपाय कर रहे हैं
Wednesday, 26 July 2017
*****उनकी मंशा है*****
उनकी मंशा है
मठा डाल
कुशों की भांति
जड़ो को नष्ट करने की
इसीलिए वे ढोते हैं
मटकियों में मठा
और नापते है हर दफा
मटकी की सतह
वे बचाये रखना चाहते हैं
मठा और जड़ के बीच की
वैमनस्यता
जिससे वेे दे सकें
कार्य को मंशानुरूप
अंजाम
उन्हे तुमसे भी नफ़रत है
कुशों की भांति
क्योंकि वे कुश ही थे
जो बार बार फेर देते थे
इरादों पर पानी
और भरते थे
हा से अहा तक की
हुंकार
जिसकी गर्जन से हर बार
पड़ता है
उन्हें सहमना
जो खिलाफ था
उनकी फितरत के
इसीलिए वे नष्ट कर देना
चाहते हैं
सदा सदा के लिए
कुशों की जड़ों सा
तुम्हारी जड़ों को
जिससे रोका जा सके
तुम्हारी गति
और तुम्हारा वेग
***** वे तुमसे छीन लेना चाहते हैं*****
वे तुमसेे छीन लेना
चाहते है
तुम्हारी आजादी
काट देना चाहते हैं
तुम्हारे उठे हुए हांथ
खड़ा कर देना चाहते हैं
खौफ का जिन्न
इसीलिए करना चाहते हैं
शक्ति की नुमाइस
उत्पन्न कर सकें जिससे
एक अनाम डर
आड़ में जिसकी तोपी
जा सकें
अनगिन कायराना हक़ीकतें
वे मौन कर देना चाहते हैं
हलक की आवाज
बांध देना चाहते हैं
तुम्हारी जिह्वा
जिससे बड़ी सहजता से
ठहराया जा सके तुम्हे
गुनहगार
वे खोद देना चाहते है
एक अलंघनीय खाई
जिसे लांघ सकना हो जाये
लगभग असम्भव
ऊँची दीर्घा पर खड़े हो वे
करना चाहते है
घोषणा बतौर हाकिम
उनकी बनाई परिखाओं को
लांघना
उन्हे बर्दास्त नही
वे बना देना चाहते हैं
पीढियों को गुलाम
जिन्हे प्रयोग किया जा सके
मशीनों की भांति
हांका जा सके पशुओं की तरह
लेकिन वे भूल जाते हैं
इतिहास के क्रूर पन्नों को
जिन्होंने कभी नहीं बख्शा
अपने समय में नायकत्व का दंभ
भरने वाले
शक्ति में अंधे पड़ चुके
गंधाते घमण्ड को
Friday, 14 July 2017
*****फिर से*****
मै जानता हूं
पेड़ों की शाखाएं
जो नये पत्तो संग
मनाती हैं उत्सव
मधुर मधुप की
थाप पर करती है
शास्त्रीय नृत्य
और उनके साथ ही
फिजाओ' में घोलती है
बसंत
खुशियों के बीच झूमते
वृक्ष नदी और पहाड़
आज भी परेशान हैं
टूटन और खत्म होती
प्रजातियों के
रिसते जख्मों से
यद्यपि कारवां निकल चुका है
बहुत आगे
किन्तु जख्म
हरे होने पर फिर से
आमादा हैं