Wednesday, 8 February 2017

******रिश्तों की फेहरिश्त******

रिश्तों की फेहरिश्त
लम्बी हो
यह आवश्यक नहीं
ना ही पहिचान है
किसी शख्शियत की
रिश्ते और फेहरिश्त
अक्सर दे देतें है
धोखा
और काम आता है
सिर्फ और सिर्फ
आपका हौसला
जो ढूंढ निकालता है
मंजिल
और मंजिल तक का फासला
जिसमे लगे होते हैं
असीमित अवरोध
रास्तों और मंजिलों के
जिससे रोका जा सके
संभावनाओं के घुमावदार
रास्ते
और ठहराया जा सके
रोक को उचित

Tuesday, 7 February 2017

*****नकचढ़ी हो गई दिल्ली*****

नकचढ़ी हो गई है
दिल्ली
तीन तिकड़मी
नज़र चढाये
नाक भौं सिकोड़ती
दिल्ली
नये कुतर्क के साथ
जलालत के रंग
उभारती
नकचढी हो गई है
दिल्ली
दल्लों के गल्लों सी है
सज्जादों के लफ्जों में
गुलेल लगाती
अपने ही अपने में
मशगूल रहती
पुरस्कारों की खोह सी
बहुधंधी सी
नकचढी हो गई है
दिल्ली

Thursday, 2 February 2017

*****बहुत जरूरी होता है*****

बहुत ज़रुरी होता है 
अनावश्यक बातों पर
हस्ताक्षेप
जैसे जरूरी होती
भूख के लिये रोटी
खाली हाथों के लिये
काम
रिश्तों के लिये रिश्तों की
अहमियत
वैसे ही जरूरी होता है
अनावश्यक बातों पर
हस्ताक्षेप
जैसे जरूरी होता है
आस पास शेष बच गये
लोगो को देखना
और वीरान हो चुके रास्तों पर
छूटे क़दमों के निशानों का
छूट जाना
वैसे ही जरूरी होता है
अनावश्यक बातों पर
हस्ताक्षेप
जैसे जरूरी होता
स्वांग के पीछे स्वांग रचाते
किरदार
अंधेलों के बीच उजाला
शब्दों के साथ शब्दों का
अहमियत
वैसे ही बहुत जरूरी होता है
अनावश्यक बातों पर
हस्ताक्षेप करना

Tuesday, 31 January 2017

****अंधेरा****

क्या सच में अंधेरा
उतना ही भयावह है
जितना उसके बारे में
कहा और सुना जाता है
और उजाला
उतना ही उजला है
जितना उसके बारे में
प्रचारित और प्रसारित किया जाता है
शायद हम गुमराह हैं
अंधेरा न तो उतना
भयावह होता है
जितना कहा और सुना जाता है
और उजाला
उतना भी उजला नहीं होता
जितना प्रचारित और प्रसारित किया जाता है
वरन उजाले से भी अधिक
वफादार होता है अंधेरा
जो साये की तरह रहता है
ताउम्र साथ
तुम्हारे अस्तित्व की तरह
अनाम सहचर सा
तुम्हारे सभी काले पक्षों को
अपने में मिला कर
दिखने लगता है काला

Thursday, 26 January 2017

****तलाश.ही लेते हो****

तलाश ही लेते हो
नये ठिकाने चाणक्य
क्योंकि तुम्हारे पास होता
चन्द्रगुप्त जैसा हथियार
तुम आज भी सीचते हो
मठा से कुशों की जड़े
और रोपते हो
जातिभेद की पौध
आज भी तुम उजाड़ते हो
गुलजार बस्तियां
तलाश ही लेते हो
नये ठिकाने
करवाने को अपनी
जय जयकार
फेंक देते हो
अशरफियों के नूतन हार
छोड़ आत्मसम्मान
बांध पैरों में घुंघरू
नाचने लगते है
चारण भाट
तलाश ही लेते हो
नये ठिकाने चाणक्य
ढांप देते हो आंतों की भूख
सरेआम लुटी हुई
अबला की आबरू
सैनिकों के कटे हुए
सरों की पीड़ा
पढने की चाहत
और अपराधियों के
अनगिनत अपराध
काढ़ लेते हो
सर्वग्यता का सुनहरा मुखौटा
फिर शुरू होता है
तुम्हारा असली खेल
तलाश ही लेते हो
नये ठिकाने चाणक्य

Sunday, 22 January 2017

*****झूठे सपने*****

मुझे मालूम है
वे गढ रहे हैं
नई भाषा और
भाषा के नये शब्द
क्योंकि वे मानते हैं
पुरानी भाषाएं
और उनके शब्द
नाकाफी है
उनके उद्देश्यों की
पूर्ति के लिए
क्योकि वे थाम लेते हैं
गाहे बेगाहे
विरोधियों का दामन
और पूरी शिद्दत के साथ
झुठला देते हैं
भावनाओं में रंगे पुते
छद्म को
और वे साधना हैं
हकीकत को
भाषा के दामन में ढांप
अपनी मंशा
उन्हे पता है
नई भाषा और शब्दों की
गोलन्दाजी
नहीं समझ पायेंगी
उनकी चाल और चरित्र का
विद्रुप चेहरा
जिससे वह आसानी से दे
सकता है
चमकती आंखो को
झूठे सपने

Thursday, 19 January 2017

****बसन्त आने का****

पूस के दिन की तरह
दिखता और छुपता
शबनम के आकर्षण में
सद्य: स्नात
भोर के साथ सुर मिलाते
पंक्षी की तरह
अपने डैनों को फैलाता
चहलकदमी करता वह
सूर्य की प्रथम किरण के
आगमन पर
कोर्टरों में झाँकते
जीवन सा
आज भी वह
कर रहा  है इंतजार
पतझड़ में तवाह हो चुके
विहान में
बसन्त आने का