बार-बार बोलना
बार-बार तोलना
बार-बार मोलना
अच्छा नहीं होता
यह ढोर डंगर सा
मोलना तोलना और
बोलना
फितरत बन गई है
शायद
मिटाना होगा
हाँ मिटाना होगा
गढने होंगे मानवता के
नये मान
जीवन और जंग की
बात
परिभाषित करनी
होगी फिर से
परिभाषायें
तभी जीती जा
सकती है
शर्म और वेहयायी
और तभी लगाई जा
सकती है
शर्त
भूत के वर्तमान से
Wednesday, 9 November 2016
*****भूत के वर्तमान से*****
Monday, 7 November 2016
*****रात के आखिरी पहर में*****
रात के आखिरी
पहर में
कलम दवात लेकर
तुम लिख रहे हो
आक्रोश
अंधेरे के विरुद्ध
तुम शायद दुनिया के
पहले इंसान हो
जो सोचते हो कि
अंधेरे में लिखे तुम्हारे
शब्द
तुम्हे अंधेरे से लड़ने का
हौसला देंगे
और एक दिन तुम
जीत जाओगे
अंधेरेे में अंधेरेे से
*****कवि तुम इतना डरे हुये क्यों हो ?*****
कवि तुम इतना डरे हुए
क्यों हो ?
कही तुमने जुर्म के
खिलाफ
कविता तो नहीं
लिख दी
कही भदेश भाषा के
अनगढ़ शब्दों तो नहीं
पिरो दिये
जो सारे गिद्ध
तुम्हे नोच खाने को
उतावले हैं
पर कवि तुम डरना
नहीं
इन बेइमान गिद्धो से
आज तक इन्होंने ही
रोक रखी थी
मानव बनने की
राह
और जब तुम जैसा
निर्भीक कवि
इन्हे चुनौती दे रहा है
ये डराने के सारे
भोथरे
उपाय कर रहे हैं
*****तुम्हारे शहर में *****
तुम्हारे शहर में
शब्दों ने मेरे
बगावत कर दी
साथ चलने को कहा
तो अदावत कर ली
तुम्हारे शहर में
शब्दों ने मेरे
बगावत कर दी
निकली थी जगहें कुछ
परिचित सी
सुकूं मिला था
रूह को थोड़ा
मगर शब्दों की
बेवफाई में
दूर होती गईं वे
तुम्हारे शहर में
शब्दों ने मेरे
बगावत कर दी
गुलमोहर का फूलना अकस्मात नहीं था न ही प्रकृति का कोई वरदान था बाल्कि उसका फूलना आक्रोश था उन्मादी सूर्य के प्रति एक दृढ अवलम्ब था आशा की डूबती किरण के प्रति उसका फूलना तपिस से दुलकते आंसुओं के प्रति एक शांत्वना थी गुलमोहर का फुलना अकस्मात नहीं था बल्कि कोयल के राग का प्रेम आलाप था जो कौओं की हंसी के विरुद्ध एक उद्घोस था जो हर युद्ध की शुरुआत से पूर्व द्वारपालो द्वारा बजाया जाता है
*****पोथियों के बीच से निकलते शब्द*****
पोथियों के बीच से
निकलते शब्द
शोर नहीं करते
वे अपनी बात बड़ी
खामोशी से
कह जाते है
और समझने वाले
समझते है
पोथियो के शब्द
जो विद्रोह करते !
जनाब
जरा गौर से तो देखो
ये शब्द खामोश तो
होते हैं
पर वेजुवान नहीं होते
और उनकी यही खामोशी
तोड़ जाती है
सूरमाओं का साहस
प्रेयसियों के प्रेमपाश
और तोड़ जाती है
स्वाभिमान की जर्जर
बेड़ियाँ
और दिखा देती है
अपनी खामोश ताकत का
तर्जुबा
Saturday, 5 November 2016
*****तुम हार रहे थे****
तुम हार रहे थे
पर तुम्हे गुमान था
शाख पर उलटे लटके
चमगादड़ो सा
जिन्हे न अपनी
परवाह होती है
न ही तुम्हारी
उन्हे गर्व होता है
अपने घुग्घू होने का
अपने मेहमानों का
जो आ जाते हैं
समय की हड़बड़ी में
जल्दी
और उनकी ही शाख पर
जल्द ही
उल्टा लटक
गुनगुनायेंगे
सांझ का गीत
और यह तब तक
जब तक भिंसार की
आहट न मिलेगी